
- बंटवारे में गडरासिटी छोड़ 7 किमी दूर हिंदुस्तान में बस गए परिवार
- आज 15 हजार से ज्यादा आबादी वाला कस्बा
- विकास की रफ्तार
गडरारोड (बाड़मेर). भारत में एक गांव ऐसा भी है जो अपना जन्मदिन आजादी के साथ मनाता है। सीमावर्ती गडरारोड गांव की यह खुशनसीबी है। 15 अगस्त 1947 से पहले यहां रहने वाले तमाम लोग पाकिस्तान के गडरासिटी में रहते थे। विभाजन हुआ तो ये वहां से रातों-रात गडरारोड आ गए। गडरासिटी पाकिस्तान में रह गया और गडरारोड भारत में। अब यह गांव कस्बा बन गया है। 79 साल के हुए गडरारोड के लोग अपने इस फैसले पर आज भी गर्व करते हैं कि उन्होंने पाकिस्तान की बजाय भारत को चुना। 15 अगस्त 1947 से पहले वे पाकिस्तान के गडरासिटी में रहते थे। अच्छे व्यापार के लिए मशहूर गडरा गांव उस समय गडरासिटी के नाम से जाना-पहचाना जाता था। बताते हैं कि गडरासिटी के व्यापारियों की हुंडियां जोधपुर, मुंबई से कराची और हैदराबाद तक चलती थीं। भारत-पाक बंटवारा हुआ तो 24 घंटे में गडरासिटी (पाकिस्तान) को खाली कर माहेश्वरी व अन्य परिवार गडरारोड (भारत) में आ गए। 13 अगस्त 1947 से पहले गडरासिटी को खाली करके 7 किमी दूर हिंदुस्तान की सरहद में रेलवे स्टेशन के पीछे व्यवस्थित तरीके से नया गांव बसा लिया और नाम रखा गडरारोड।
कुछ यों हुआ विकास...
- 15 हजार से अधिक आबादी।
- उपखंड मुख्यालय, तहसील व, पंचायत समिति मुख्यालय।
- सहायक अभियंता कार्यालय बिजली, पानी। 132 केवी जीएसएस।
- हर घर नल कनेक्शन 1965 से उपलब्ध है।
- रेलमार्ग का जुड़ाव यहां अंग्रेजों के जमाने से है।
- नेशनल हाईवे संख्या 25 और भारतमाला हाईवे से जुड़ाव
- राजकीय महाविद्यालय, सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र।
- 12वीं तक बालक, बालिका विद्यालय।
- 500 से अधिक दुकानों वाला बड़ा बाजार।
उधर, वीरान पड़ा है पाक का गडरासिटी...
पाकिस्तान का गडरासिटी अब वीरान पड़ा है। गांव उजड़ने के बाद वहां कोई नहीं बसा। गडरारोड के सामने पाकिस्तान से लगते गांवों में न सड़क है, न बिजली, न कोई सुविधा। अत्याचार और पीड़ा से भरे सामने पाकिस्तान में रहने वाले लोग, जो इनकी रिश्तेदारी में हैं, वे यही कहते हैं कि वे भी भारत आना चाहते हैं।