
हुब्बल्ली. केशवापुर स्थित वासुपूज्य जैन संघ में चल रहे चातुर्मास के दौरान साध्वी दक्षज्योति ने ‘कल्याण मित्र’ और ‘निर्जरा’ के आध्यात्मिक महत्व पर प्रकाश डालते हुए कहा कि जीवन में मित्र अनेक होते हैं, लेकिन सच्चा कल्याण मित्र वही है, जो आत्महित की बात करे, गलतियों को प्रेमपूर्वक समझाए और धर्म, संयम तथा सदाचार के मार्ग पर आगे बढऩे की प्रेरणा दे। उन्होंने कहा कि केवल अच्छा मित्र पाने की इच्छा रखना पर्याप्त नहीं है, बल्कि स्वयं भी किसी के जीवन में कल्याण मित्र बनने का प्रयास करना चाहिए। ऐसा मित्र स्वार्थ या किसी प्रतिफल की अपेक्षा नहीं रखता, बल्कि नि:स्वार्थ भाव से दूसरे के आत्मकल्याण की कामना करता है।साध्वी दक्षज्योति ने बताया कि आत्मा पर बंधे कर्मों का क्षय होना निर्जरा कहलाता है। तप, संयम, त्याग, साधना और आत्मचिंतन के माध्यम से कर्मों की निर्जरा की दिशा में आगे बढ़ा जा सकता है। उन्होंने कहा कि धार्मिक क्रिया से अधिक महत्वपूर्ण उसके पीछे की भावना है। तप, दान और सेवा यदि केवल प्रतिष्ठा के लिए हों तो आत्मचिंतन आवश्यक है। उन्होंने श्रद्धालुओं से आह्वान किया कि वे अपने धार्मिक पुरुषार्थ को आत्मशुद्धि और कर्मनिर्जरा से जोड़ें। प्रवचन का संदेश रहा कि सच्ची मित्रता हमें केवल प्रसन्न नहीं करती, बल्कि बेहतर इंसान और निर्मल आत्मा बनने की प्रेरणा देती है।
Updated on:
16 Aug 2026 06:01 am
Published on:
16 Aug 2026 06:01 am
