
अयोध्या के राम मंदिर में हुए करीब 7 से 7.5 करोड़ रुपये के चढ़ावे और दान चोरी मामले के सामने आने के बाद देश की राजनीति पूरी तरह गरमा गई है। इस बेहद संवेदनशील और हाई-प्रोफाइल मुद्दे पर राजस्थान के पूर्व मुख्यमंत्री और वरिष्ठ कांग्रेस नेता अशोक गहलोत ने नई दिल्ली स्थित अखिल भारतीय कांग्रेस कमेटी (AICC) मुख्यालय में एक प्रेस कॉन्फ्रेंस की। इस दौरान उन्होंने राजस्थान राज्य के संदर्भ को जोड़ते हुए एक सनसनीखेज बयान दिया। पूर्व मुख्यमंत्री ने राम मंदिर निर्माण में राजस्थान के भरतपुर जिले के बंसी पहाड़पुर के पत्थरों के ऐतिहासिक योगदान का ज़िक्र किया और कहा कि मरुधरा के लोगों का इस मंदिर से एक बेहद गहरा और पवित्र भावनात्मक लगाव है, क्योंकि तत्कालीन कांग्रेस सरकार ने तमाम कानूनी अड़चनों को दूर कर मंदिर निर्माण के लिए लीगल तरीके से पत्थर भिजवाया था। ऐसे में इतने पवित्र स्थान पर करोड़ों रुपये के चढ़ावे की कथित चोरी होना देश की आम जनता के भरोसे के साथ एक बड़ा विश्वासघात है।
अशोक गहलोत ने प्रेस वार्ता में सालों पुराने घटनाक्रम का खुलासा करते हुए बताया कि जब अयोध्या में राम मंदिर का निर्माण कार्य शुरू हो रहा था, तब भरतपुर के बंसी पहाड़पुर इलाके में बड़े पैमाने पर अवैध खनन चल रहा था और वहीं का पत्थर मंदिर के लिए ले जाया जा रहा था।
गहलोत ने कहा, "उस समय श्री राम जन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र ट्रस्ट के महासचिव चंपत राय जी और उनके सहयोगी दिनेश जी मुझसे जयपुर में आकर मिले थे। मैंने उनसे साफ शब्दों में कहा था कि आप राम मंदिर जैसा बेहद पवित्र और ऐतिहासिक काम करने जा रहे हैं, इसलिए इस महान कार्य में किसी भी तरह के अवैध पत्थर का इस्तेमाल नहीं होना चाहिए। आपको वहां केवल लीगल माइनिंग का प्रमाणित पत्थर ही ले जाना चाहिए, ताकि मंदिर की पवित्रता पर कोई आंच न आए।"
पूर्व मुख्यमंत्री ने प्रशासनिक प्रक्रिया को याद करते हुए बताया कि बंसी पहाड़पुर का वह मुख्य माइनिंग एरिया वन्यजीव और वन विभाग की सीमा के तहत आता था, इसलिए वहां से कानूनी रूप से पत्थर निकालना लगभग असंभव था। यह मामला इतना गंभीर था कि बात सीधे प्रधानमंत्री कार्यालय (PMO) तक पहुंच गई। इसके बाद पूर्व प्रधानमंत्री के प्रधान सचिव और राम मंदिर ट्रस्ट के भवन निर्माण समिति के अध्यक्ष नृपेंद्र मिश्रा ने मुख्यमंत्री कार्यालय राजस्थान से संपर्क साधा।
गहलोत ने बताया, "हमने पूरे मामले की गंभीरता को समझा और राम मंदिर की जनभावनाओं का आदर करते हुए राज्य सरकार की तरफ से उस पूरे क्षेत्र को फॉरेस्ट लैंड की केटेगरी से बाहर निकालने की मजबूत सिफारिश केंद्र को भेजी। राम मंदिर का मामला होने के कारण हमने फाइलों को बहुत तेजी से क्लियर करवाया, वरना जिन प्रशासनिक कामों में बरसों लग जाते हैं, उसे हमारी सरकार ने स्मूथली पूरा करवाकर लीगल तरीके से पत्थर उपलब्ध कराया। उस वक्त ट्रस्ट की ओर से हमें धन्यवाद भी दिया गया था।"
बंसी पहाड़पुर के पत्थरों की इस कानूनी लड़ाई का हवाला देते हुए अशोक गहलोत ने वर्तमान में चल रहे दान चोरी विवाद पर बेहद कड़ा रुख अख्तियार किया। उन्होंने दुख जताते हुए कहा कि जिस मंदिर के लिए पूरे देश के लोगों ने अपनी गाढ़ी कमाई से दान दिया और राजस्थान सरकार ने हर कानूनी नियम को शिथिल कर पत्थर भिजवाया, आज उसी पवित्र कार्य के चढ़ावे में इतनी बड़ी वित्तीय हेराफेरी के आरोप लग रहे हैं।
गहलोत ने तीखा हमला बोलते हुए कहा, "राम मंदिर के कैश-काउंटिंग विभाग में हुई करोड़ों रुपये की चोरी की इस कथित घटना ने भारतीय जनता पार्टी और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (BJP-RSS) के चाल, चरित्र और चेहरे को देश की आम जनता के सामने पूरी तरह से बेनकाब कर दिया है। आज देश के हर राज्य, हर गांव और हर घर में इस गबन की चर्चा हो रही है, जिसने करोड़ों सनातनियों की आस्था को गहरी ठेस पहुंचाई है।"
इस बीच, अयोध्या से आ रही प्रशासनिक रिपोर्टों के अनुसार, राम मंदिर ट्रस्ट के मुख्य परिसर से करोड़ों रुपये और बेशकीमती चांदी के गायब होने की प्राथमिक एसआईटी (SIT) रिपोर्ट आने के बाद प्रशासनिक हलचल तेज हो गई है। उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के कड़े और सख्त रुख को देखते हुए ट्रस्ट के महासचिव चंपत राय ने नैतिक जिम्मेदारी लेते हुए अपने पद से इस्तीफा दे दिया है, जिसे ट्रस्ट की आपातकालीन बैठक में स्वीकार भी कर लिया गया है।
इस महाघोटाले की जांच कर रही स्पेशल इन्वेस्टिगेशन टीम (SIT) ने चंपत राय को तलब कर करीब 6 घंटे तक मैराथन पूछताछ की है ताकि यह पता लगाया जा सके कि कैश काउंटिंग रूम में सीसीटीवी कैमरों की मौजूदगी के बावजूद इतनी बड़ी लापरवाही और गबन कैसे होता रहा।
हालांकि, पुलिस द्वारा दर्ज की गई मुख्य एफआईआर (FIR) में सीधे तौर पर चंपत राय का नाम शामिल नहीं है, जिसे लेकर विपक्षी दलों ने जांच की निष्पक्षता पर सवाल उठाए हैं। लेकिन पुलिस ने कार्रवाई करते हुए कैश काउंटिंग टीम के 8 कर्मचारियों को अरेस्ट कर लिया है और उनके ठिकानों से चोरी की गई भारी मात्रा में नगदी बरामद की है।
दूसरी तरफ, पूर्व आईएएस अधिकारी और भवन निर्माण समिति के अध्यक्ष नृपेंद्र मिश्रा इस वित्तीय घोटाले की जांच के दायरे से पूरी तरह बाहर हैं क्योंकि उनका कार्य केवल भौतिक ढांचे के निर्माण तक सीमित है।
वर्तमान में नृपेंद्र मिश्रा ट्रस्ट की गिरती साख को बचाने के लिए एक मुख्य प्रशासनिक संकटमोचक की भूमिका निभा रहे हैं और उनकी देखरेख में एक नई सर्च कमेटी बनाकर भविष्य की सुरक्षा के लिए नया मुख्य कार्यकारी अधिकारी खोजने की कवायद शुरू कर दी गई है।