— बेस्टसेलिंग सह-लेखकों की नई किताब में बतााय जयपुर। भारत की किफायती, लेकिन असरदार नवाचार संस्कृति पर आधारित नई किताब ‘लीनस्पार्क: फ्रूगल बाई डिजाइन, ग्लोबल इन इम्पैक्ट’ का विमोचन जयपुर लिटरेचर फेस्टिवल में किया गया। यह किताब चर्चित लेखक और शिक्षाविद जयदीप प्रभु (कैम्ब्रिज यूनिवर्सिटी), प्रियांक नारायण (अशोका यूनिवर्सिटी) और मुकेश सूद (आईआईएम अहमदाबाद) ने […]
— बेस्टसेलिंग सह-लेखकों की नई किताब में बतााय
जयपुर। भारत की किफायती, लेकिन असरदार नवाचार संस्कृति पर आधारित नई किताब ‘लीनस्पार्क: फ्रूगल बाई डिजाइन, ग्लोबल इन इम्पैक्ट’ का विमोचन जयपुर लिटरेचर फेस्टिवल में किया गया। यह किताब चर्चित लेखक और शिक्षाविद जयदीप प्रभु (कैम्ब्रिज यूनिवर्सिटी), प्रियांक नारायण (अशोका यूनिवर्सिटी) और मुकेश सूद (आईआईएम अहमदाबाद) ने मिलकर लिखी है।
करीब एक दशक पहले, कैम्ब्रिज यूनिवर्सिटी में मार्केटिंग के प्रोफेसर जयदीप प्रभु ने अपनी प्रभावशाली किताब ‘जुगाड़ इनोवेशन’ के जरिए जुगाड़ की अवधारणा को वैश्विक मंच पर पेश किया था। ‘लीनस्पार्क’ उसी बौद्धिक यात्रा का अगला कदम है। जयदीप प्रभु ने कहा, “लीनस्पार्क नवाचार और विकास को आगे बढ़ाने के एक सोच-समझकर अपनाए गए और उद्देश्यपूर्ण तरीके के बारे में है। यह सिर्फ तेज और कम खर्चीला होने तक सीमित नहीं है, बल्कि ऐसे समाधान तैयार करने की बात करता है जो मजबूत हों और लंबे समय तक टिकाऊ रहें।”
अशोका यूनिवर्सिटी में उद्यमिता और प्रबंधन के एसोसिएट प्रोफेसर तथा इंफोएज सेंटर फॉर एंटरप्रेन्योरशिप के संस्थापक निदेशक प्रियांक नारायण ने कहा कि वैश्विक शोध और भारतीय केस स्टडीज के आधार पर ‘लीनस्पार्क’ जुगाड़ को सिर्फ सस्ता अस्थायी उपाय मानने की आम धारणा से आगे निकलता है। उन्होंने बताया कि यह किताब फ्रूगल सोच को एक व्यवस्थित, दोहराए जा सकने वाले और अलग-अलग परिस्थितियों में अपनाए जा सकने वाले मॉडल के रूप में प्रस्तुत करती है। उन्होंने यह भी कहा, “इस किताब में क्रिकेट, इलेक्ट्रिक व्हीकल्स, फ्रूगल एआई और यहां तक कि अंतरिक्ष मिशनों से जुड़े नवाचारों की कहानियां भी शामिल हैं।”
पैनल चर्चा में जेएलएफ के सह-संस्थापक संजय रॉय और अभिनेत्री व कंटेंट क्रिएटर साहिबा बाली भी शामिल रहीं, जिनकी फ्रूगल उद्यमिता की यात्राओं को इस किताब में जगह दी गई है। उनकी कहानियों ने दिखाया कि रचनात्मक समस्या-समाधान, संसाधनों के अनुशासित उपयोग और दीर्घकालिक सोच किस तरह साधारण और सीमित शुरुआत को मजबूत सांस्कृतिक और व्यावसायिक संस्थानों में बदल सकती है। अपने व्यक्तिगत अनुभव साझा करते हुए साहिबा बाली ने सीमाओं के बीच कई करियर संभालने की बात कही। उन्होंने कहा, “लीनस्पार्क ने उन फैसलों को शब्द दिए, जिन्हें मैं पहले सहज रूप से ले रही थी। इस किताब ने मुझे समझने में मदद की कि ना कहना, सीमित संसाधनों में काम करना और लंबी अवधि की सोच अपनाना वास्तव में आपकी रचनात्मक आज़ादी को और बढ़ा सकता है।”
फ्रूगल सोच अब केवल उभरते बाजारों तक सीमित नहीं
चर्चा का सार प्रस्तुत करते हुए मुकेश सूद ने बताया कि फ्रूगल सोच अब केवल उभरते बाजारों तक सीमित नहीं रह गई है। दुनियाभर में स्टार्टअप संस्थापक पूंजी की कमी, तेज बदलाव और टिकाऊ विकास जैसी चुनौतियों से जूझ रहे हैं, ऐसे में यह कभी भारतीय मानी जाने वाली सोच अब वैश्विक स्तर पर प्रासंगिक होती जा रही है। उन्होंने कहा, “संसाधनों की कमी एक फायदा भी हो सकती है। यह ऐसी सोच को जन्म देती है, जिसे अब कई वैश्विक कंपनियां दोबारा सीखने की कोशिश कर रही हैं।” इस सत्र में खचाखच भीड़ रही और कई श्रोता खड़े होकर गलियारों में सुनते नजर आए। लंबा प्रश्नोत्तर सत्र भी हुआ, जिससे उद्यमियों, छात्रों और नीति-निर्माताओं की गहरी रुचि साफ झलकी। कार्यक्रम के बाद भी कई लोग रुके रहे और लेखकों से मुलाकात कर अपनी किताबों पर हस्ताक्षर करवाए। जेएलएफ में ‘लीनस्पार्क’ के विमोचन ने इस बात पर भी व्यापक चर्चा को जन्म दिया कि उद्यमी सोच केवल स्टार्टअप्स के लिए ही नहीं, बल्कि संस्थानों, पूरे इकोसिस्टम और समाज के लिए क्यों जरूरी है।
‘लीनस्पार्क’ पेंगुइन रैंडम हाउस द्वारा प्रकाशित है और अमेज़न और देशभर के प्रमुख बुकस्टोर्स पर उपलब्ध है। संजीव बिकचंदानी, आर ए माशेलकर, यूसुफ हामिद और प्रमथ राज सिन्हा जैसे विचारकों और संस्थान निर्माताओं का समर्थन पाने वाली यह किताब भारत को किसी अपवाद के रूप में नहीं, बल्कि वैश्विक नवाचार के भविष्य के लिए एक मॉडल के रूप में प्रस्तुत करती है। यह किताब नवाचार, उद्यमिता और टिकाऊ विकास पर देशों के बीच चल रही बहसों में समयानुकूल और अहम योगदान देती है, और भारत को दुनिया के लिए एक ब्लूप्रिंट के तौर पर स्थापित करती है।