
विकास जैन/जयपुर. दस हजार रुपए तक की एमआरपी वाली दवा आपको बाजार में 2500 से 10,000 तक अलग-अलग कीमत में मिल जाएगी। यह जानकर आप चौंकिएगा नहीं, क्योंकि सभी दवाओं की अधिकतम एमआरपी तय नहीं होने से असाध्य रोगों की दवाओं पर भी राजधानी समेत प्रदेशभर में बेलगाम वसूली का खेल चल रहा है। दवा निर्माता कैंसर जैसी महंगी दवाइयों पर भी मनमानी एमआरपी अंकित कर बाजार में भेज रहे हैं। एक ही एमआरपी की दवा और बेचने की कीमत में इतना बड़ा अंतर विक्रेताओं के लिए लूट का रास्ता खोल रहा है। राजस्थान पत्रिका ने राजधानी के दवा बाजार में पड़ताल की तो यह हकीकत सामने आई।
दरअसल, औषधि नियंत्रण अधिनियम में सभी दवाइयों की अधिकतम कीमत ही तय नहीं है। इसका फायदा निर्माता, वितरक और खुदरा विक्रेता जमकर उठा रहे हैं। इसलिए विक्रेता दस हजार रुपए एमआरपी वाली दवा के किसी से 2500, किसी से 5 हजार तो किसी से पूरे 10 हजार रुपए तक वसूल कर रहे है। असल में अन्य उत्पादों की तरह निर्माता से डिपो, फिर वितरक, वितरक से खुदरा विक्रेता और फिर ग्राहक तक पहुंचते पहुंचते दवा के दाम 30 प्रतिशत से भी अधिक बढ़ जाते हैं। पड़ताल में यह भी सामने आया है कि वितरक उन्हीं दवाओं को अधिक बेच रहे हैं, जिन पर ज्यादा मुनाफा मिलता है। वितरकों के दबाव में कई गुनाएमआरपी प्रिंट करते है।
यहां इन दवाओं की एमआरपी और विक्रय कीमत इसलिए दिखाई गई है कि यदि एमआरपी से इतने कम दाम में वह बेची जा रही है तो ये दवाएं दिखाई गई एमआरपी पर भी विक्रय करने की भी विक्रेता को छूट है। इसका फायदा कुछ डॉक्टर भी कमीशन के रूप में उठा रहे हैं। वे मरीज को आधी कीमत पर दवा दिलवाने के लिए भी कह रहे हैं।
लूट की ऐसे निकली राह
उदाहरण के तौर पर निर्माता ने किसी दवा को डिपो पर 2500 रुपए में भेजा। डिपो से यह दवा 4 प्रतिशत मुनाफे के साथ 2600 रुपए में वितरक तक। वितरक से 8 प्रतिशत मुनाफे के साथ खुदरा विक्रेता तक यह दवा 2808 रुपए में पहुंचेगी। खुदरा विक्रेता इसे 3370 रुपए में बेचेगा। यानी, यह इसकी एमआरपी होगी। लेकिन अधिकतम एमआरपी तय नहीं होने वाली दवा पर निर्माता एमआरपी पर ही इस दवा पर 8 से 10 हजार रुपए तक अंकित कर देता है, जिससे मरीज को पता ही नहीं चल पाता कि वास्तविक कीमत क्या है। इस तरह विक्रेता को 10 हजार एमआरपी की दवा को इससे कम तक किसी भी कीमत पर बेचने का अधिकार मिल जाता है। जबकि उसकी अप्रत्यक्ष अधिकतम कीमत 3370 रुपए या उसके आसपास ही होनी चाहिए। विक्रय की इस चेन की हर कड़ी का मुनाफा जयपुर के दवा कारोबार से जुड़े लोगों से बातचीत के आधार पर निकाला गया है।
पीएम और उपराष्ट्रपति तक पहुंचा मामला
हाल ही निजामाबाद चैंबर ऑफ कॉमर्स एंड इंडस्ट्री ने भी दावा किया है कि खुदरा विक्रेता दवाओं पर 30 गुना तक दाम वसूल कर रहे हैं। इसके लिए प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी और उप राष्ट्रपति वैंकेया नायडू को भी पत्र लिखकर नीति बनाने की मांग की गई है। पत्र में देशभर में सभी दवाओं की अधिकतम कीमत तय करने की भी मांग की गई है। चैंबर ने 1097 दवाओं की सूची भी पीएमओ को भेजी है। जिन्हें 100 प्रतिशत से 2100 प्रतिशत मुनाफे तक में बेचा जा रहा है। यह भी बताया है कि यदि सरकार एमआरपी पर नियंत्रण करती है तो चिकित्सा खर्च में 85 से 90 प्रश तक की कमी आ सकती है।
औषधि नियंत्रक अजय फाटक से सवाल जवाब
प्र. औषधि नियंत्रण अधिकारी दवा दुकान के निरीक्षण में क्या देखते हैं
उ. - फार्मासिस्ट है या नहीं, एक्सपायरी दवा तो नहीं बिक रही है, बिल काटे जा रहे हैं या नहीं
प्र. इन दवाओं के अलावा क्या यह नहीं देखते कि एक दवा का किसी से 2500, किसी से 5 हजार या किसी से 10 हजार रुपए तक वसूल किया जा रहा है।
उ. - ये मूल्य नियंत्रण के दायरे में ही नहीं है तो हम क्या कर सकते हैं।
प्र. इसका मतलब विक्रेता कोई भी कीमत वसूल सकता है।
उ. - आज कैंसर जैसी दवा में भी ऐसा ही हो रहा है, कई मामलों में तो डॉक्टर मरीज को यह कह देते हैं कि तुम्हारी एक डोज फ्री करवा देता हूं। जबकि वास्तविकता में उसके पीछे मोटा मुनाफा छिपा होता है।
प्र. दवा के दाम कितने वसूल रहे हैं, क्या यह भी देखते हैं?
उ. - करीब 350 दवाएं मूल्य नियंत्रण के दायरे में हैं, उनको ही देखते हैं बाकी दवाओं को हम नहीं देखते।