राजधानी का गोपालपुरा बायपास (अब परशुराम मार्ग), यहां सुबह से देर शाम तक युवाओं का जमावड़ा रहता है।
जगदीश विजयवर्गीय की रिपोर्ट
राजधानी का गोपालपुरा बायपास (अब परशुराम मार्ग), यहां सुबह से देर शाम तक युवाओं का जमावड़ा रहता है। लड़के और लड़कियां दोनों लगभग बराबर की संख्या में। कोई प्रदेश तो कोई देश के किसी कोने से। हर हाथ में स्मार्ट फोन। सौ में से तीस-चालीस के मोबाइल से जुड़े तार दोनों कानों में। यानी कोई गाने सुनने, कोई बात करने में व्यस्त। खास बात यह कि इस मार्ग पर जितनी संख्या इन युवाओं की, उतनी ही बाहरी मजदूरों और स्थानीय लोगों की।
मैंने सड़क किनारे एक जूस सेंटर के सामने गाड़ी रोकी। पास में प्लास्टिक के स्टूलों पर कुछ युवा बैठे थे। कुछ स्मार्ट फोन पर अंगुलियां चला रहे थे, कुछ आपस में बात कर रहे थे। उनकी चर्चा का मुद्दा कुछ और था लेकिन मैंने देश-समाज और चुनाव की बात छेड़ी तो वे तपाक से बोले, जिसकी मुझे उम्मीद नहीं थी।
इनमें से एक रोशन पटेल बोले, मैं उदयपुर के मनवाखेड़ा से आया हंू। पशुधन सहायक की परीक्षा देने। तीसरा साल हो गए। सीनियर सलेक्ट हो गए। क्या हालत है, अप्रेल में फार्म भरवाए थे, परीक्षा अब हो रही है। रोशन ने सवाल दागा, हम क्या समझते नहीं? फिर खुद बोले- हम सब समझते हैं। कीचड़ जैसी है राजनीति।
उन्हें लगा कि ये चार हजार वोटर नए हैं, कब्जे में आ सकते हैं तो 29 सितंबर को परीक्षा हुई और फटाफट रिजल्ट निकाल दिया। बाकी भले इन्तजार ही करते रहो। रोशन मानो तैश में थे। बोलते गए, मुझे सबसे ज्यादा चिढ़ मचती है भेदभाव से। ये अलग, वो अलग। भगवान ने किसी पर ठप्पा लगाकर नहीं भेजा लेकिन ये लोग बांट देते हैं।
इतने में पास बैठी एक लड़की बोली, हां नेताओं की इस बात पर तो मुझे भी बहुत गुस्सा आता है। पूरे युवा समूह को बातचीत में शामिल होते देख मैंने मोबाइल चालू करते हुए पूछा आपका क्या नाम है तो गुस्साए चेहरे पर मुस्कुराहट तैर गई। बोली, विचार तो ले लो लेकिन नाम और फोटो-वोटो तो आप रहने ही दो। वरना घरवाले कहेंगे कि यह क्या पंचायती कर रही थी। मैंने कहा ठीक है। इस पर कुछ सैकंड तक कुछ सोचती रही, फिर बोली एक नहीं कई नेता ऐसे हैं जिनके पास खूब पैसा है फिर भी उनके घरवालों के नाम बीपीएल में है।
नाम नहीं बताने वाली लड़की तमतमाती हुई बोली तो अब तक चुपचाप देख-सुन रही अन्य लड़की बोली मेरा नाम शर्मिला चौधरी है। हनुमानगढ़ की हंू। मैं कहना चाहती हंू कि ये नेता लोग युवाओं से वोट बटोरते हैं। जो जीत जाता है, वह वापस नहीं आता। तब ही आता है, जब वापस चुनाव हों। नाटक करता है। गरीबों के पास जाता है, बच्चों को गोद में लेता है।
बात नेताओं के धोखे की चली तो नाम नहीं बताने वाली लड़की फिर बोली, व्यवस्था ही गलत है ना। सच्चे को दबा दिया जाता है। बहुमत को देखा जाता है, नेक आदमी को नहीं। जो लोगों की सुन-समझ सकता है, जनता के बीच रह सकता है उसे नहीं बनाएंगे। बनेगा वही, जिसके पास बहुमत होगा। और बहुमत... वह तो खरीद लिया जाता है। कभी पैसे से, कभी दबाव से। यही चलता आ रहा है, यही चलता रहेगा।
मैंने कहा, कुछ बदलेगा कैसे जब आप जैसे अच्छे लोग आगे नहीं आना चाहते। नाम तक नहीं बताना चाहते। इस पर वह बोली, ये बात अलग है, वो अलग। आप नहीं जानते, कई सवाल उठते हैं। प्रतापगढ़ के यशवंत मीणा ने कहा, नेता इतने शातिर हैं कि दो-चार सौ रुपए में शराब पिलाकर वोटों को खरीदने पर उतर आते हैं।
खैर, इन युवाओं में ज्यादातर ऐसे थे जिन्होंने या तो पहली बार पिछले चुनाव में वोट दिया था, या अब पहली बार वोट देंगे। इसके बाद मैंने आसपास की गलियों में गाड़ी घुमाई। गुर्जर की थड़ी पर एक चाय की थड़ी के सामने रुका।
वहां बैठे लोगों से चर्चा छेड़ी तो स्थानीय निवासी शेरसिंह चौहान बोले हमें क्या चाहिए? सड़क, नाली, पानी जैसी सुविधाएं ही न? ये सुविधाएं न मिलें तो क्या फायदा? विधायक ऐसा हो जो स्थानीय लोगों की समस्याएं समझे, उन्हें दूर कराए।
शेरसिंह, रत्तीराम सहित अन्य लोगों ने कहा, पैसों की कमी नहीं है। पैसे तो खूब आते हैं लेकिन बिचौलिए खा जाते हैं। उदाहरण के लिए, किसान तो प्याज पांच रुपए किलो बेचे और मंडी से लोग वही प्याज पच्चीस रुपए किलो में लाएं, ऐसा क्यों? बिचौलियों को खत्म करना चाहिए।
किसान पूरे देश के लिए अन्नदाता के समान है। दिखावा नहीं, किसानों का हर हाल में भला होना चाहिए। यदि किसान ही नहीं बचा तो फिर आप और हम आखिर कैसे बच पाएंगे?