जयपुर

जलवायु बदलाव की मार, खेती पर संकट

फिलहाल केंद्र सरकार ने इस विपदा को 'कुदरती आपदा' मानकर करीब 2.49 लाख हेक्टेयर फसल के नुकसान का आकलन लगाकर सभी प्रदेश सरकारों को सर्वेक्षण कर मुआवजा देने को आदेशित किया है।

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Apr 14, 2026

डॉ. रमेश ठाकुर, वरिष्ठ पत्रकार एवं स्तंभकार - असमय बारिश और ओलावृष्टि की तबाही से समूचे देश की खेतीबाड़ी तहस-नहस हो गई है। अचानक हुई मूसलाधार बारिश व तेज हवाओं से किसानों की छमाही वाली मेहनत पर पानी फिर गया। नुकसान सबसे ज्यादा रबी की फसलों को पहुंचा है, जिनमें गेहूं सरसों और चने की फसलें प्रमुख रूप से शामिल हैं। लीची और आम के पेड़ भी नष्ट हुए हैं। फिलहाल केंद्र सरकार ने इस विपदा को 'कुदरती आपदा' मानकर करीब 2.49 लाख हेक्टेयर फसल के नुकसान का आकलन लगाकर सभी प्रदेश सरकारों को सर्वेक्षण कर मुआवजा देने को आदेशित किया है। प्रदेश सरकारों ने नुकसान की भरपाई के लिए उच्चस्तरीय समीक्षा के बाद बर्बाद हुई फसलों का सर्वेक्षण करना भी आरंभ कर दिया है। पर, जितना नुकसान धरातल पर किसानों का हुआ है, उतने की भरपाई सरकारी सर्वेक्षण के बाद शायद हो पाए? खेती किसानी पर निर्भर मुख्य रूप से राजस्थान, उत्तर प्रदेश, हरियाणा, पंजाब, उत्तराखंड, बिहार व मध्यप्रदेश जैसे प्रमुख सूबे बारिश से सर्वाधिक प्रभावित हैं। इन राज्यों में गेहूं की पकी फसलें हवा में गिर गईं और बारिश के पानी से सडऩे लगी हैं।

नुकसान पर सरकारें बेशक सर्वे कराकर प्रभावित किसानों को 'प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना' के तहत राहत देने का प्रयास करती हों। लेकिन लगातार बेमौसम बारिश के कारण किसानों का कर्ज और मुसीबतें बढ़ रही हैं। सरकारें, बेशक इस बारिश को 'कुदरती आपदा' करार दें? पर, कड़वी सच्चाई वही है जो मौसम वैज्ञानिक बता रहे हैं। डिजास्टर मैनेजमेंट इसे कुदरती आपदा नहीं, बल्कि जलवायु परिर्वतन, पश्चिमी विक्षोम, अल-नीनो जैसी वायुमंडलीय परिस्थितियां ही बता रहे हैं। पिछले 5 वर्षों में बेमौसम बारिश और ओलावृष्टि से भारत में करीब 80 लाख हेक्टेयर फसलें तबाह हुई हैं। इससे देश का अन्नदाता लगातार कर्ज में डूबा है। कर्ज बढऩे के बाद किसान आत्महत्या जैसे कदम उठाने पर मजबूर होते हैं? मौजूदा बारिश ने महाराष्ट्र में प्याज और आम की फसल को लगभग नष्ट किया है। जबकि, कर्ज में डूबे किसानों की आत्महत्या करने के आंकड़े वहां सर्वाधिक है। अनचाही बारिश रबी की फसलों पर कटाई के ऐन वक्त आफत बनकर टूटती हैं। बाढ़, सूखा, चक्रवात, भूकंप, भूस्खलन और बेमौसम बारिश का आना अब आम हो गया है।

कृषि पर वैसे ही संकट का बादल मंडराया हुआ है। अनचाही बारिश से उत्पन्न समस्याओं ने इस संकट को और गहरा दिया है। अगर याद हो तो इन्हीं दिनों में पिछले वर्ष भी तबाही वाली बारिश हुई थी। तब गनीमत ये थी फसल कट चुकी थी। वैसे भी किसान कृषि को अब घाटे का सौदा मानने लगे हैं। सौ रुपए के आसपास डीजल का भाव है। कायदे से अनुमान लगाए तो किसानों की लागत का मूल्य भी फसलों से नहीं लौट पाता? यही वजह है कि खेती नित घाटे का सौदा बनती जा रही है। इसी कारण धीरे-धीरे किसानी से मोहभंग होने लगा है। मौजूदा बारिश से दूसरी फसलों को भी नुकसान पहुंचा है।

कागजों में किसानों के लिए सरकारी सुविधाओं की कोई कमी नहीं? एमएसपी की सुविधाओं का प्रावधान है, लेकिन जमीन पर सच्चाई कुछ और बयां करती हैं। कुल मिलाकर अन्नदाता सुख-सुविधाओं से कोसों दूर हो चुका है। सब्सिडी वाली खाद उन्हें ब्लैक में खरीदनी पड़ रही है। किसानों के लिए ईमानदारी से कुछ करने की जरूरत है। निष्क्रिय हो चुके पुराने बीमा प्रावधान को रिफॉर्म किया जाए, ताकि बेमौसम बारिश, ओलावृष्टि व बिजली गिरने आदि घटनाओं से बर्बाद हुई फसलों के नुकसान से उन्हें उभारा जा सके। कृषि सेक्टर से सरकार कतई मुंह नहीं फेर सकती? क्योंकि कृषि सेक्टर संपूर्ण जीडीपी में 20-25 फीसदी भूमिका निभाती है इसलिए कृषि को हल्के में नहीं ले सकते।

Published on:
14 Apr 2026 03:17 pm
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