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जल उपलब्धता बढ़ी तो महिलाओं की जिंदगी बदली

पिछले पांच वर्षों में ग्रामीण नल कनेक्शन 17 प्रतिशत से बढ़कर 79 प्रतिशत (2024) हो गए हैं, जिससे 15.2 करोड़ घरों तक जल पहुंच रहा है।

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सुपर्णा कात्यायनी (प्रोग्राम लीड), मुनीष कुमार उपाध्याय(प्रोग्राम एसोसिएट) - जल और लैंगिक समानता आपस में गहराई से जुड़े विषय हैं। महिलाएं प्रतिदिन घरों, खेतों और समुदायों में जल का इंतजाम तो करती हैं, लेकिन जल शासन (वाटर गवर्नेंस)) में उनकी भागीदारी बहुत सीमित बनी हुई है, जिसके गंभीर परिणाम सामने आ रहे हैं। देश के कई हिस्सों में महिलाओं को प्रतिदिन औसतन 35 मिनट सिर्फ पानी लाने में खर्च करना पड़ता है, जो उनकी शिक्षा, आजीविका, स्वास्थ्य और खुशहाली को नकारात्मक रूप से प्रभावित करता है। इतना ही नहीं, जलवायु परिवर्तन का जोखिम देश के आधे से अधिक जिलों को अत्यधिक जल समस्याओं (वाटर स्ट्रेस) के प्रति संवेदनशील बना रहा है। इस दिशा में केंद्र सरकार की 'जल जीवन मिशन' जैसी प्रमुख योजना एक निर्णायक बदलाव ला रही है। पिछले पांच वर्षों में ग्रामीण नल कनेक्शन 17 प्रतिशत से बढ़कर 79 प्रतिशत (2024) हो गए हैं, जिससे 15.2 करोड़ घरों तक जल पहुंच रहा है। जल की सहज उपलब्धता महिलाओं और लड़कियों के लिए पूरे वर्ष में 27 दिनों के अतिरिक्त समय की बचत कर रही है, जिससे उनकी आर्थिक भागीदारी बढ़ रही है। गुजरात की 'मुख्यमंत्री महिला पानी समिति प्रोत्साहन योजना' इसका बेहतरीन उदाहरण है, जहां 500 समितियां पूरी तरह से महिलाओं द्वारा संचालित हैं और 1,900 से अधिक समितियों में उनकी भागीदारी 70 प्रतिशत है। काउंसिल ऑन एनर्जी, एनवायर्नमेंट एंड वाटर (सीईईडब्ल्यू) के अध्ययन के आधार पर, ये कदम भारत को ऐसे भविष्य की तरफ ले जा सकते हैं, जहां जल सुरक्षा और लैंगिक समानता एक-दूसरे को मजबूती प्रदान करें।

सबसे पहले, भारत को जल, कृषि और आजीविका के बीच नीतिगत तालमेल को मजबूत बनाना चाहिए। लैंगिक समानता एक ऐसी प्राथमिकता है, जो खाद्य, भूमि और जल से जुड़ी नीतियों को आपस में जोड़ती है। इसका एक सटीक उदाहरण राजस्थान में मिलता है। 'राजस्थान जल क्षेत्र आजीविका सुधार परियोजना' के तहत 137 सिंचाई संरचनाओं का आधुनिकीकरण किया गया है और जल शासन में लैंगिक पक्ष को जोड़ा गया है। इसने कृषि, महिला एवं बाल विकास और ग्रामीण विकास जैसे विभिन्न विभागों को एक मंच पर लाने का काम किया है। वर्ष 2017 में राज्य के सहभागी सिंचाई प्रबंधन अधिनियम में संशोधनों ने 'जल उपयोगकर्ता संघों' में महिला प्रतिनिधित्व को मजबूत बनाया है। 'नीतिगत तालमेल' का दूसरा उदाहरण 'ओडिशा मिलेट्स मिशन' है, जिसने जलवायु-अनुकूल कृषि को महिलाओं के आर्थिक सशक्तीकरण से जोड़ा है। लंबे समय से मोटे अनाज की खेती की संरक्षक मानी जाने वाली आदिवासी महिलाएं इस कार्यक्रम की 'वैल्यू चेन' (मूल्य शृंखला) के केंद्र में हैं। मिशन शक्ति के सहयोग से कृषि विभाग एवं किसान कल्याण ने महिला स्वयं सहायता समूहों को 'मिलेट शक्ति कैफे' जैसे सामुदायिक उद्यम चलाने में सक्षम बनाया है। दूसरा, भारत को निर्णय प्रक्रिया में महिलाओं की समान भागीदारी वाला एक जल सुरक्षित भविष्य बनाने के लिए अपने बढ़ते सार्वजनिक निवेश का लाभ उठाना चाहिए। भारतीय कृषि कार्यबल में लगभग तीन-चौथाई हिस्सेदारी होने के बावजूद, महिलाएं जल प्रबंधन के औपचारिक फैसलों से बाहर रहती हैं। केंद्रीय बजट 2025-26 के 'जेंडर बजट' में 37 प्रतिशत की अभूतपूर्व वृद्धि एक सकारात्मक बदलाव है। इसमें 'जल संसाधन' और 'पेयजल एवं स्वच्छता' विभागों का प्रमुख योगदान है, जिनके कुल आवंटन का 30 प्रतिशत से अधिक हिस्सा जेंडर बजट के तहत आता है। सीईईडब्ल्यू और इंटरनेशनल वाटर मैनेजमेंट इंस्टीट्यूट के एक साझा अध्ययन के अनुसार, महिलाओं को निर्णयन प्रक्रिया के केंद्र में लाने के लिए लक्षित सार्वजनिक वित्तपोषण जरूरी है। पीएम मत्स्य संपदा योजना में इसे अपनाते हुए महिलाओं, एससी/एसटी को परियोजना लागत का 60 प्रतिशत तक धन आवंटित किया जाता है। महिलाओं के निर्णय लेने के अधिकार, कौशल और नेतृत्व को मजबूत बनाने के लिए बेहतर प्रावधान और समन्वय के साथ आय व भागीदारी की निगरानी करने की भी जरूरत है।
तीसरा, जल शासन में सभी स्तरों पर महिला प्रतिनिधित्व और क्षमता को बढ़ाना चाहिए। महिलाओं की संस्थागत

भागीदारी तय करती है कि नीतियों में उनके ज्ञान और उनकी जरूरतें शामिल रहें। 'जल जीवन मिशन' ने ग्राम जल व स्वच्छता समितियों में महिलाओं के लिए 50 प्रतिशत प्रतिनिधित्व अनिवार्य बनाया है। जल गुणवत्ता जांच के लिए 'जल सखियों' का प्रशिक्षण सामुदायिक स्तर पर उनकी तकनीकी क्षमता को मजबूत बना रहा है। इन प्रयासों का गहरा व स्थायी सामाजिक-आर्थिक प्रभाव सुनिश्चित करना अब भी एक चुनौती है, जिसे दूर करने की जरूरत है। जल शासन को जब महिलाएं आकार देती हैं, तो जल सुरक्षा बढ़ती है, आजीविकाएं लचीली बनती हैं और समुदायों को जलवायु परिवर्तन के लिए बेहतर रूप से तैयार होने में मदद मिलती है।