जयपुर

व्हाइट टॉपिंग 15 साल से जस की तस… 2 साल में टूटती डामर सड़कें; हर साल बह जाते 200 करोड़, क्या सीखेंगे विभाग?

सड़कों के निर्माण में धांधली हो रही है। डामर की सड़क बनाने और बारिश में उधड़ जाने, उसके बाद फिर से बनाने की प्रक्रिया को ही सरकारी महकमे विकास समझ बैठे हैं।

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Jul 27, 2025
जयपुर में सड़क। फोटो: पत्रिका

जयपुर। सड़कों के निर्माण में धांधली हो रही है। डामर की सड़क बनाने और बारिश में उधड़ जाने, उसके बाद फिर से बनाने की प्रक्रिया को ही सरकारी महकमे विकास समझ बैठे हैं। इस प्रक्रिया में अभियंताओं से लेकर ठेकेदारों का फायदा है। तभी तो व्हाइट टॉपिंग (सीमेंट की सड़क) को आगे नहीं बढ़ाया।

वर्ष 2010 में गांधी नगर मोड़ से लक्ष्मी मंदिर तिराहे तक सड़क व्हाइट टॉपिंग से बनाई गई थी। डेढ़ दशक में इस हिस्से को दोबारा बनाने की जरूरत नहीं पड़ी। वहीं, दूसरी सड़कें दो वर्ष में तार-तार हो जाती हैं। इनमें ज्यादातर सड़कें शहर के बाहरी इलाकों की हैं। राजधानी जयपुर की बात करें तो बरसात में 200 करोड़ रुपए से अधिक की सड़कें बह जाती हैं। राज्य के अन्य शहरों की बात करें तो यह आंकड़ा 1000 करोड़ रुपए से अधिक का है।

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यों समझें…. व्हाइट टॉपिंग व डामर की सड़क में अंतर

कहां से कहां तकः गांधीनगर गोड से लक्ष्मी मंदिर राक एफ सीमेंट कम्पनी ने 30 मीटर चौड़ाई की सड़क निःशुल्क बनवाई थी।
आज के हिसाब से खर्चा: करीब छह करोड़ रुपए। (वहीं, डामर की सड़क इसी आकर में तीन करोड़ में बन जाएगी।)
सिंगल लेनः सामान्य तौर पर फॉलोनी की सड़कें होती है।
सीमेंट रोड: 60 लाख रुपए में एक किमी लम्बाई और 12 फीट चौड़ाई में बन जाएगी। वहीं इसी आकार में डामर की सड़क बनाने में 27 से 29 लाख खर्च होंगे।

खास-खास

-500 करोड़ रुपए से अधिक सालाना खर्च होते हैं राजधानी में सड़कों के नाम पर।
-2 बार भी कई सड़कें वर्ष भर में हो जाती हैं क्षतिग्रस्त, बनाने में खर्च होते हैं करोड़ों।

यहां बनाएं

धावास रोड, करणी पैलेस रोड, सिरसी रोड, एमडी रोड, गांधी पथ-पश्चिम सहित ऐसे स्थान जहां पर जलभराव होता है। वहां पर सीमेंटेड रोड का निर्माण किया जाए।

ये फायदा

डामर की सड़क में तीन वर्ष और सीमेंट की सड़क में पांच वर्ष डिफेक्ट लायबिलिटी पीरियड होता है। (जेडीए के अधिकारियों से बातचीत के आधार पर)

ये भी बेहतर विकल्प

राजधानी के चर्च रोड और गवर्नमेंट हॉस्टल चौराहे पर ब्लॉक बिछाए गए। ये काम वर्ष 2011 में जेडीए ने कराया था। आज तक दोबार सड़क बनाने की जरूरत नहीं पड़ी। जेडीए अधिकारियों की मानें तो ब्लॉक्स लगाने का काम सीमेंटेड रोड और डामर की सड़क से भी 25 से 30 फीसदी सस्ता पड़ता है।

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