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जयपुर. तेजी से विस्तार ले रहे शहर में ऊंची-ऊंची इमारतें बढ़ रही हैं। इससे हवा की गुणवत्ता घटती जा रही है और वायु प्रदूषण बढ़ रहा है, साथ ही हवा में धूल की मात्रा भी बढ़ रही है। मुंबई, दिल्ली के जैसे जयपुर में भी हालात बनते जा रहे हैं। लोगों को सांस लेने में दिक्कत हो रही है, साथ ही एलर्जी और अन्य स्वास्थ्य समस्याओं का सामना करना पड़ रहा। शहर के बाहरी क्षेत्रों में वायु गुणवत्ता सूचकांक (एक्यूआइ) 200 को पार कर रहा है। हवा में पीएम (पार्टिकुलेट मैटर)-2.5 व पीएम-10 का स्तर भी 400 से अधिक पहुंच रहा है।
शहर के जगतपुरा, प्रतापनगर, सीतापुरा, मानसरोवर, विद्याधर नगर, मुरलीपुरा, खोहनागोरियान, अजमेर रोड, सीकर रोड जैसे क्षेत्रों में अब ऊंची-ऊंची इमारतें बन रही। जगह-जगह टावर खड़े हो रहे। ऊंची इमारतों का घनत्व बढ़ता जा रहा है। निर्माण कार्य भी तेजी से बढ़ रहे हैं, इससे वायु प्रदूषण बढ़ रहा है। बाहरी क्षेत्रों में हरियाली कम होती जा रही है। खेत और हरियाली की जगह अब टॉवर खड़े हो रहे हैं। इससे खुले स्थान भी खत्म होते जा रहे हैं।
शहर में बन रही ऊंची इमारतों, निर्माण व पुनर्निमाण कार्यों के दौरान धूल नियंत्रण के उपाय असरदार तरीके से नहीं किए जाते हैं। न ही जिम्मेदार विभाग इनकी मॉनिटरिंग कर पाता है। इससे मनमर्जी से निर्माण कार्यों किए जा रहे हैं, जो हवा को प्रदूषित कर रहे हैं।
क्षेत्र - 10 जनवरी - 11 जनवरी (एक्यूआइ)
मुरलीपुरा - 242 - 114
मानसरोवर - 241 - 170
सीतापुरा - 190 - 219
शास्त्री नगर - 199 - 172
आदर्श नगर - 187 - 160
एमआइ रोड - 190 - 146
क्षेत्र - पीएम-2.5 - पीएम-10
सीतापुरा - 478 - 466
मानसरोवर - 419 - 466
मुरलीपुरा - 324 - 281
ऊंची इमारतों से हवा की गति कम हो जाती है, जिससे हवा में प्रदूषक तत्वों का फैलाव कम हो पाता है या वह फैल नहीं पाते हैं। इससे हवा की गुणवत्ता खराब हो जाती है और प्रदूषण बढ़ रहा है।
- डॉ. विजय सिंघल, पूर्व मुख्य पर्यावरण वैज्ञानिक, राजस्थान राज्य प्रदूषण नियंत्रण मंडल
प्रदूषण से एलर्जी व अस्थमा, सीओपीडी व फेफड़ों से संबंधित अन्य बीमारियां बढ़ जाती है। अगर लोग अधिक दिनों तक प्रदूषण में रहते हैं तो हृदय से संबंधी बीमारियां होने की संभावना बढ़ जाती है।
- डॉ. अजीत सिंह, कंसल्टेंट फिजिशियन, एसएमएस अस्पताल
प्रदूषण में नाइट्रोजन डाइऑक्साइड, कार्बन मोनोऑक्साइड व कार्बन पार्टिकल्स होते हैं। इनमें 2.5 माइक्रोन आकार के कण सीधे लोगों के फेंफड़ों में जाते है, जो अस्थमा व सीओपीडी बीमारी को बढ़ाते हैं। वन माइक्रोन से छोटे कण रक्त के साथ शरीर के अन्य हिस्सों में चले जाते हैं, जो हृदयघात के कारक होते हैं।
- डॉ. विरेन्द्र सिंह, श्वास रोग विशेषज्ञ
कम चौड़ी सड़कों पर छोटे प्लॉट में बड़ी इमारते बन रही है, हो सकता है, जिनकी स्वीकृति भी नहीं ली जा रही हो। ये सेटबैक का भी पालन नहीं करती है, साथ ही सुनियोजित विकास को भी अवरुद्ध कर रही है।
- एस.एस. संचेती, पूर्व मुख्य नगर नियोजक
Published on:
12 Jan 2026 09:14 pm
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