जयपुर

संपादकीय: जस्टिस वर्मा के इस्तीफे के बाद भी बचे रहेंगे सवाल

शुरुआती हिचक के बाद जस्टिस वर्मा ने जस्टिस सौमित्र सेन और जस्टिस पीडी दिनाकरण के रास्ते को चुना है।

2 min read
Apr 12, 2026

इलाहाबाद हाईकोर्ट के जस्टिस यशवंत वर्मा ने पद से इस्तीफा देकर अपने खिलाफ लोकसभा में चल रहे महाभियोग की प्रक्रिया को पूर्णविराम देने का प्रयास किया है। उनका यह विलंब से लिया गया सही फैसला कहा जाएगा। महाभियोग से हटाए जाने की स्थिति में भारतीय न्याय व्यवस्था पर वह हमेशा के लिए एक धब्बा बन जाते। देश में अब तक किसी भी न्यायाधीश को महाभियोग के जरिए नहीं हटाया गया है। हालांकि न्यायिक इतिहास में तीन मौके ऐसे जरूर आए थे। पहला 1993 में, जब जस्टिस वी रामास्वामी के खिलाफ लोकसभा में लाया गया महाभियोग प्रस्ताव गिर गया था। दूसरा और तीसरा 2011 में, जब जस्टिस सौमित्र सेन और जस्टिस पीडी दिनाकरण ने राज्यसभा में महाभियोग की कार्यवाही पूरी होने से पहले ही इस्तीफा दे दिया था। तब संसद ने उनके खिलाफ कार्रवाई रोक दी थी। शुरुआती हिचक के बाद जस्टिस वर्मा ने जस्टिस सौमित्र सेन और जस्टिस पीडी दिनाकरण के रास्ते को चुना है। जस्टिस वर्मा जब दिल्ली हाईकोर्ट में थे, तब उनके आवास के एक हिस्से में आग लगने पर नोटों के जले हुए बंडल पाए गए थे।

राष्ट्रपति द्वारा इस्तीफा स्वीकार किए जाने के बाद, यशवंत वर्मा न्यायाधीश नहीं रह जाएंगे। उनके पद छोडऩे के बाद संसद में चल रही जांच की दिशा क्या होगी, यह लोकसभा अध्यक्ष के निर्णय पर निर्भर करेगा। अक्सर इस्तीफा होने के बाद ऐसी जांच प्रक्रियाएं बंद कर दी जाती हैं, क्योंकि संबंधित व्यक्ति संवैधानिक पद पर नहीं रह जाता। इस प्रकरण से कई कानूनी और नैतिक प्रश्न खड़े होते हैं। क्या पद से हटने मात्र से किसी न्यायाधीश पर लगे सारे आरोप समाप्त हो जाते हैं, जिनकी जांच संसद कर रही हो? क्या एक न्यायाधीश को रिटायरमेंट के बाद मिलने वाले लाभों को सुरक्षित रखने के लिए इस्तीफे को ढाल बनाना चाहिए? समय आ गया है कि न्यायाधीशों के विरुद्ध गंभीर शिकायतों के निपटारे के लिए एक अधिक प्रभावी और पारदर्शी तंत्र विकसित किया जाए। सिर्फ 'इन-हाउस' जांच करने या संसद में महाभियोग लाने जैसे रास्तों से इतर नया तरीका भी खोजा जाना चाहिए जो त्वरित व निष्पक्ष हो।

न्यायपालिका की पवित्रता बनाए रखने की जिम्मेदारी स्वयं न्यायाधीशों की है। यह उनके पास ही रहनी चाहिए क्योंकि, यह काम किसी और को दिया गया तो उससे पवित्रता के और खतरे में पडऩे की आशंका से इनकार नहीं किया जा सकता। इसलिए जरूरी है कि सर्वोच्च न्यायालय जस्टिस वर्मा प्रकरण से उठे सवालों का स्थायी समाधान खोजे। यह इस्तीफा केवल पद से मुक्ति हो सकता है, लेकिन यह उन पर लगे आरोपों से मुक्ति नहीं है। न्याय का तकाजा है कि जांच केवल कुर्सी छीनने तक न रुके, बल्कि जनता के सामने एक नजीर बने। इसमें कोई शक नहीं कि न्यायपालिका में आत्मनिरीक्षण की प्रक्रिया अन्य संस्थाओं की अपेक्षा ज्यादा मजबूत है। लेकिन, जस्टिस वर्मा जैसे मामलों से न्यायाधीशों को दिए जा रहे 'सुरक्षा कवच' सवालों के घेरे में आते हैं।

Published on:
12 Apr 2026 01:40 pm
Also Read
View All