Rajasthan Agriculture News: राजस्थान के मरुस्थली इलाकों में किसान अब कम पानी में भी लाखों की कमाई कर रहे हैं। ड्रिप इरिगेशन और नई फसलों के प्रयोग ने सूखी जमीन को भी मुनाफे की खेती में बदल दिया है।
जयपुर। पश्चिमी राजस्थान में खेती की तस्वीर तेजी से बदल रही है। कभी केवल बारिश पर निर्भर रहने वाले किसान अब आधुनिक तकनीकों और नए प्रयोगों के जरिए खेती को मुनाफे का मजबूत जरिया बना रहे हैं। कम पानी वाले इस क्षेत्र में ड्रिप इरिगेशन और बागवानी के मेल ने खेती को नई दिशा दी है, जिससे किसानों की आय में उल्लेखनीय बढ़ोतरी हो रही है और वे लाखों में कमाई कर रहे हैं।
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पश्चिमी राजस्थान, जहां पहले पारंपरिक खेती तक ही सीमित संभावनाएं थीं, अब नवाचार का केंद्र बनता जा रहा है। यहां किसान अनार, खजूर, अंजीर और ड्रेगन फ्रूट जैसी फसलों की खेती कर रहे हैं। इन फसलों की खासियत यह है कि इन्हें कम पानी की आवश्यकता होती है और बाजार में इनकी अच्छी कीमत मिलती है। ड्रिप इरिगेशन तकनीक ने रेतीली जमीन को भी उपजाऊ बना दिया है, जिससे उत्पादन क्षमता में बड़ा सुधार हुआ है।
औषधीय खेती भी किसानों के लिए नई उम्मीद बनकर उभरी है। एलोवेरा और अश्वगंधा जैसी फसलों की मांग लगातार बढ़ रही है। एलोवेरा की खेती खास तौर पर आसान मानी जाती है, क्योंकि इसे न तो ज्यादा पानी चाहिए और न ही पशुओं से नुकसान का खतरा होता है। किसान खेत की मेड़ों और ऊंचे स्थानों पर इसकी खेती कर रहे हैं। इसकी पत्तियों से सब्जी और अचार तैयार किए जाते हैं, जो लंबे समय तक उपयोग में आते हैं और स्वास्थ्य के लिए भी लाभकारी हैं।
अश्वगंधा की खेती में भी किसानों की रुचि तेजी से बढ़ी है। बाजार में इसकी मांग इतनी अधिक है कि कई कंपनियां सीधे खेतों से ही फसल खरीद रही हैं। इससे किसानों को बेहतर दाम मिल रहे हैं और बिचौलियों की भूमिका कम हो रही है। इसके अलावा, जीरा और ईसबगोल जैसी पारंपरिक फसलों ने भी राजस्थान की अर्थव्यवस्था को मजबूती दी है। यहां की गर्म जलवायु इन मसालों की गुणवत्ता को बेहतर बनाती है, जिससे अंतरराष्ट्रीय बाजार में इनकी मांग बनी रहती है। निर्यात के जरिए किसानों को अच्छा लाभ मिल रहा है। अब राजस्थान का किसान केवल पारंपरिक खेती तक सीमित नहीं है, बल्कि वह वैश्विक बाजार को ध्यान में रखते हुए फसल का चयन कर रहा है। नई तकनीकों और बदलती सोच के साथ मरुस्थल की जमीन अब सोना उगलने लगी है।