विदेशी गायें डायबिटीज की चपेट में

मारवाड़ में पल रही विदेशी नस्ल की गायें भी अब मधुमेह की चपेट में आ रही है।

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Nov 30, 2015
मारवाड़ में पल रही विदेशी नस्ल की गायें भी अब मधुमेह की चपेट में आ रही है। नतीजन, उनकी प्रजनन और दुग्ध उत्पादन क्षमता भी इससे प्रभावित होने लगी है। यह खुलासा पशु विशेषज्ञ सुभाष कच्छवाह और जोधपुर डेयरी की ओर से करवाए गए एक सर्वे रिपोर्ट में हुआ है। मधुमेह को किटोसिस के समकक्ष माना गया है। किटोसिस ब्लड में ग्लूकोस का लेवल कम होने से होता है।

शोध के अनुसार डेयरी ने बीते दो साल में गांवों में विदेशी नस्ल की गायों की सर्वे रिपोर्ट तैयार की है। डेयरी के मार्केटिंग हैड सुधीर शर्मा ने बताया कि आरसीडीएफ के जरिए सरकार को भेजी जाएगी ताकि बीमारी पर रोकथाम के उपाय शुरू हो सके।

सर्वे में सामने आई बीमारियां
सर्वे के अनुसार गायों में यह बीमारी लक्षणविहीन रूप में सामने आई है। पशुपालन विज्ञान में इस बीमारी को किटोसिस नाम से जाना जाता है। शोधकर्ता ने दो साल तक जोधुपर, पाली, जैसलमेर, बाड़मेर व बीकानेर व नागौर जिले की विदेशी गायों के स्वास्थ्य की जाचं की।

डेयरी ने भी दूध की आपूर्ति की जानकारी इकट्टा करने पर यह बात सामने आई। शोधकर्ता कच्छवाह अनुसार गायों में लक्षणविहीन बीमारियों में मेसटाइटिस, किटोसिस, मिल्क फीवर, डाउनर काऊ सिंड्रोम, ब्लउ इन यूरिन जैसी बीमारियाी पाई गई है।

यह बीमारियां पशुओं में प्रजनन क्षमता तो कम करती है साथ ही प्रजनन के पहले व बाद में तेजी से फैलती है। इसमें सर्वाधिक घातक मधुमेह को मनाया गया है। इस रोग से दूध का उत्पादन आधा हो जाता है।

इसलिए चपेट में आ रही विदेशी नस्ल
शोध में पता चला कि पशुपालक अधिक दूध के लिए विदेशी नस्ल की गायें पाल तो लेते हैं, लेकिन पोषण पूरा नहीं देने से विदेशी नस्ल की गायें अपने फेट को शरीर के भीतर सोखकर अपनी भूख मिटाती है। वह जब प्रजनन लायक होती है तो लक्षणविहीन बीमारियों का शिकार होकर दूध में कमी कर देती है।

धीरे-धीरे कमजोर होकर वे बीमार हो जाती है, जबकि देसी नस्ल की गायों के साथ एेसा नहीं होता। क्योंकि उनको दूध क्षमता के अनुसार ही पोषण मिल जाता है। जर्सी व होलिस्टीन फ्रिजियन विदेशी नस्ल की गायों में किटोसिस बीमारी सामने आई है।

इनका कहना है
यह रोग के ऊपर निर्भर करता है कि वो पशु के उत्पाद को कितना प्रभावित करता है। जहां तक मधुमेह ग्रस्ति गाय के दूध का सवाल है तो एेसे दूध के सेवन करने से आदमी के स्वास्थ्य पर कोई प्रतिकूल प्रभाव नहीं पड़ता है।
-डॉ. पुखराज सिंह राठौड़, वरिष्ठ पशु विशेषज्ञ

गायों के खून के नमूनों की दो प्रकार से जांच की गई। पहली जांच एनईएफएसी की थी जो पशु के प्रजनन के ठीक पहले की की गई थी। दूसरी जांच बीएचए की थी। जिससे किटोसिस व अन्य लक्षण हीन बीमारियों का पता चला।
-सुभाष कच्छवाह, शोधकर्ता

विदेशी नस्ल की गायों में यह बीमारी पाई गई है। दूध की आवक नहीं होने से कई गांवों में इस प्रकार की गायों के दूध उत्पादकता जांच करवाने पर पता चला कि डायबिटीज की बीमारी के चलते प्रजनन क्षमता व दूध की उत्पादकता कम हो रही है। इस बारे में मुख्यालय को रिपोर्ट भेज रहे हैं।
-वाईके व्यास, एमडी, जोधपुर सरस डेयरी
Published on:
30 Nov 2015 01:20 pm
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