
चेन्नई. किलपॉक स्थित एससी शाह भवन में चातुर्मासार्थ विराजित मुनि तीर्थचैतन्य विजय ने स्वतंत्रता दिवस के संदर्भ में प्रवचन देते हुए कहा कि परमात्मा ने आत्मा को कर्मों के बंधन से मुक्त करने का मार्ग बताया है। इसी प्रकार 15 अगस्त भारत के लिए गुलामी से मुक्ति और स्वतंत्रता का प्रतीक है। स्वतंत्रता का वास्तविक आनंद वही अनुभव कर सकता है, जिसके हृदय में राष्ट्रभक्ति और मातृभूमि के प्रति प्रेम हो। जैसे पिंजरे से मुक्त होने पर पक्षी आनंदित होता है, वैसे ही वर्षों की पराधीनता के बाद मिली स्वतंत्रता का महत्व प्रत्येक देशवासी को समझना चाहिए। हमारे शास्त्रों में भी कहा गया है माता और जन्मभूमि स्वर्ग से भी महान हैं। जिस भूमि ने हमें जन्म दिया, उसके उपकारों को स्मरण करना हमारा कर्तव्य है। हमारे जीवन में माता-पिता, गुरु, धर्मशासन, संघ, समाज और मातृभूमि का योगदान है। मनुष्य कितना भी आगे बढ़ जाए, उसे अपनी सफलता के पीछे रहे लोगों के उपकारों को नहीं भूलना चाहिए। जैन दर्शन में भी मार्गानुसारिता के गुणों में कृतज्ञता का विशेष महत्व बताया गया है।
मातृभूमि की स्वतंत्रता और सम्मान के लिए महापुरुषों ने अपना सर्वस्व न्योछावर किया। सच्ची सेवा वही है, जिसमें दान या सहयोग के बदले नाम, यश अथवा प्रतिफल की अपेक्षा न हो।