
केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह द्वारा चित्तौड़गढ़ में 'वंदे मातरम' को लेकर दिए गए भाषण के बाद राजस्थान की राजनीति में सियासी उबाल आ गया है। पूर्व मुख्यमंत्री और कांग्रेस के वरिष्ठ नेता अशोक गहलोत ने एक सोशल मीडिया पोस्ट जारी करते हुए शाह के बयानों को उनका 'अपराध बोध' करार दिया और 1896 के कलकत्ता कांग्रेस अधिवेशन से लेकर 1942 के भारत छोड़ो आंदोलन तक वंदे मातरम के आधिकारिक इतिहास का हवाला देते हुए भारतीय जनता पार्टी और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ पर निशाना साधा। गहलोत ने स्वतंत्रता संग्राम से दूर रहने तथा अब सत्ता में आकर इतिहास के पन्नों को बदलने की कोशिश करने का सीधा आरोप लगाया ।
केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने रविवार को चित्तौड़गढ़ दौरे के दौरान अपने संबोधन में कांग्रेस पार्टी को निशाने पर लिया था। खासतौर से दिल्ली स्थित कांग्रेस मुख्यालय में 'वंदे मातरम' के विवादित घटनाक्रम का ज़िक्र करते हुए कांग्रेस पर कथित तुष्टीकरण नीति के आरोप लगाए थे। शाह ने आरोप लगाया कि स्वतंत्रता दिवस कार्यक्रम के दौरान जब बंकिम चंद्र चट्टोपाध्याय की अमर कृति 'वंदे मातरम' का गायन हो रहा था, तब कांग्रेस की शीर्ष नेता सोनिया गांधी ने चालू गान के बीच में ही पार्टी अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे को गाना रुकवाने का इशारा किया। अमित शाह ने कहा कि पूरा देश टीवी पर इस दृश्य को देखकर स्तब्ध रह गया। उन्होंने कहा कि तुष्टीकरण और वोट बैंक की राजनीति के चक्कर में कांग्रेस ने आजादी के इस महामंत्र को इतिहास के पन्नों से मिटाने की कोशिश की है। उन्हें माफ़ी मांगनी चाहिए।
गृह मंत्री के बयान के बाद पूर्व मुख्यमंत्री अशोक गहलोत ने तीखी प्रतिक्रिया व्यक्त की। गहलोत ने कहा कि चित्तौड़गढ़ में अमित शाह द्वारा वंदे मातरम पर दिया गया भाषण सुनकर इतिहास के जानकारों को हंसी आई है।
गहलोत ने लिखा कि भाजपा और आरएसएस का वंदे मातरम से कभी कोई संबंध नहीं रहा। आज सत्ता में आने के बाद इतिहास पर प्रवचन देना इनका केवल अपराध बोध है। उन्होंने कहा कि अपने इसी अपराध बोध को छुपाने के लिए ये लोग अब संसद में वंदे मातरम को लेकर कानून बनाने की बातें कर रहे हैं।
पूर्व सीएम ने स्पष्ट किया कि भाषणों से इतिहास के पन्ने नहीं बदले जा सकते और देश की जनता सच्चाई को अच्छी तरह से जानती है।
अपनी पोस्ट में अशोक गहलोत ने राष्ट्रगीत 'वंदे मातरम' के इतिहास और कांग्रेस पार्टी के स्वतंत्रता संग्राम का ऐतिहासिक ब्योरा सामने रखा।बताया कि 1896 में पहली बार कांग्रेस के कलकत्ता अधिवेशन में गुरुदेव रवींद्रनाथ टैगोर ने 'वंदे मातरम' गाया था।
1905 के बाद से यह राष्ट्रगीत हर कांग्रेस अधिवेशन की एक अनिवार्य परंपरा बन गया। स्वतंत्रता सेनानियों ने अंग्रेजों की लाठियां खाईं, जेल गए और जुर्माना भरा, लेकिन वंदे मातरम का उद्घोष बंद नहीं किया। गुरुदेव रवींद्रनाथ टैगोर की सलाह पर 1937 में इसका ऐसा समावेशी स्वरूप अपनाया गया ताकि यह देश के हर नागरिक का साझा गीत बन सके।
संघ की भूमिका पर सवाल उठाते हुए अशोक गहलोत ने 1925 से लेकर 1947 तक के इतिहास का हवाला दिया। गहलोत का दावा है कि संघ के गठन से लेकर देश की आजादी तक आरएसएस ने कभी वंदे मातरम को अपना आधिकारिक गीत नहीं बनाया।
जब पूरा देश वंदे मातरम गाकर अंग्रेजों से लोहा ले रहा था, तब संघ ने अंग्रेजों की नाराजगी से बचने के लिए अपनी अलग प्रार्थना 'नमस्ते सदा वत्सले' बनाई। गहलोत के अनुसार 1942 में जब देश का बच्चा-बूढ़ा अंग्रेजों के खिलाफ सड़कों पर था, तब संघ इस आंदोलन से दूर रहा।
बंकिमचंद्र चट्टोपाध्याय द्वारा 1870 के दशक में रचित और उनके प्रसिद्ध उपन्यास 'आनंदमठ' (1882) में शामिल गीत 'वंदे मातरम' भारतीय स्वतंत्रता संग्राम का सबसे बड़ा प्रेरणास्रोत बना था। हालांकि, इसके साथ कुछ ऐतिहासिक और राजनीतिक विवाद भी जुड़े रहे हैं।
1937 में जब प्रांतीय चुनाव हुए, तो वंदे मातरम के शुरुआती दो पदों को राष्ट्रगीत के रूप में स्वीकार किया गया। गुरुदेव रवींद्रनाथ टैगोर ने पंडित जवाहरलाल नेहरू को पत्र लिखकर सलाह दी थी कि गीत के शुरुआती दो पद मातृभूमि की वंदना करते हैं और वे सभी धर्मों के लोगों के लिए सर्वस्वीकार्य हैं, जबकि बाद के पदों में धार्मिक प्रतीकों का उल्लेख है। इसी आधार पर कांग्रेस ने शुरुआती दो पदों को राष्ट्रगीत के रूप में अपनाया।
24 जनवरी 1950 को संविधान सभा के अध्यक्ष डॉ. राजेंद्र प्रसाद ने घोषणा की कि 'जन गण मन' देश का राष्ट्रगान होगा और 'वंदे मातरम' को राष्ट्रगीत का दर्जा दिया जाएगा, जिसे राष्ट्रगान के समान ही सम्मान प्राप्त होगा।
भाजपा और संघ विचारक हमेशा यह तर्क देते हैं कि 1937 में पूरे 'वंदे मातरम' को न अपनाना तुष्टिकरण की राजनीति की शुरुआत थी। वहीं कांग्रेस का पक्ष यह रहता है कि देश की विविधता और सभी समुदायों की एकजुटता को बनाए रखने के लिए यह एक सर्वसम्मत और समावेशी फैसला था।