
जयपुर. कार्तिक मास के कृष्ण पक्ष की द्वितीया तिथि पर व्रत रखा जाता है, जिसे अशून्य शयन द्वितीया व्रत कहते हैं। पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, इस दिन भगवान विष्णु जल में योग निद्रा में चले जाते हैं। जल में योग निद्रा में होते हुए भी वे संसार का पूरा ध्यान रखते हैं, इसलिए विष्णुजी की इस नींद को अशून्य शयन कहा जाता है।
ज्योतिषाचार्य पंडित सोमेश परसाई के अनुसार इस व्रत के पुण्य से हर काम का दोगुना लाभ मिलता है। वस्तुत: यह व्रत और पूजा पांच माह तक — सावन भादों, आश्विन, कार्तिक और अगहन में की जाती है। इन सभी पांचों मास के कृष्ण पक्ष की द्वितीया तिथि पर व्रत रखकर विष्णुजी और लक्ष्मीजी की पूजा की जाती है।
ज्योतिषाचार्य नरेंद्र नागर के अनुसार पद्मपुराण में अशून्य शयन व्रत का उल्लेख मिलता है। इस दिन विष्णुजी चंद्रमा के उदय होने के बाद जल में योग निद्रा में जाते हैं। वे कार्तिक कृष्ण पक्ष द्वितीया से लेकर कार्तिक पूर्णिमा तक जल में ही शयन करते हैं। यही वजह है कि कार्तिक में पावन स्नान का विशेष महत्व होता है।
इस दिन सुबह स्नान के बाद भगवान विष्णु और मां लक्ष्मी की क्षीरसागर वाली तस्वीर की विधिविधान से पूजा करें। दीप जलाएं, जल, अक्षत्, गंध, पुष्प, नैवेद्य आदि अर्पित करें। विष्णु सहस्रनाम या पुरुष सूक्त और श्रीसूक्त का पाठ करें। लक्ष्मीनारायण की आरती करें। मंत्रों से विष्णुजी और लक्ष्मीजी की स्तुति जरूर करें।