जयपुर. हिन्दी भाषा को आधुनिक स्वरूप ग्रहण करने के लिए अंग्रेजी, उर्दू तथा अन्य भाषाओं के शब्दों को सहर्ष स्वीकार करना चाहिए जिससे उसका विकास एवं विस्तार समय और आवश्यकता के अनुरूप हो सके। लगभग तीन दशक से लेखन कर रहे कर्मचारी भविष्य निधि संगठन में क्षेत्रीय भविष्य निधि आयुक्त आलोक यादव का कहना है कि किसी भी भाषा के विकास के लिए समय की जरूरतों के अनुरूप उसका विकास होना आवश्यक है।
हिन्दी भाषा भी इसका अपवाद नहीं है। हिन्दी को अपने विकास एवं विस्तार के लिए अन्य भाषाओं के शब्दों को ग्रहण करना चाहिए और उन्हें अपने व्याकरण के ढांचे में समाहित कर लेना चाहिए।
वैश्वीकरण के इस दौर में प्रौद्योगिकी और विज्ञान के शब्दों का भाषांतरण कई बार हास्यास्पद होता है और यह पूरे भाव भी प्रदर्शित नहीं करता। प्रौद्योगिकी एवं विज्ञान तथा विशेष शब्दों को ग्रहण करने से हिन्दी भी समृद्ध होगी और उसकी सम्प्रेषणता भी बढ़ेगी। भूमंडलीकरण में दूरियों का कोई महत्व नहीं है और इसे बेहतर तरीके से समझा जाना चाहिए। हिन्दी पूरी तरह से वैज्ञानिक भाषा है और इसमें समस्त भावों तथा विचारों को व्यक्त करने की क्षमता है लेकिन इसे अनुवाद की भाषा बनाने से बचना चाहिए। हिन्दी को क्षेत्र और समय में नहीं बांधा जाना चाहिए बल्कि विस्तार के लिए उसे उन्मुक्त होना चाहिए। देवनागरी में गक़ाल का स्वागत होना चाहिए, इससे भाषा समृद्ध होगी। कविता का आधार भाव, कल्पना और अध्यात्म है। इसमें गेयता और लय अनिवार्य तत्व है। मात्र शब्दों का संयोजन कविता या गकाल नहीं है। उन्होंने अतुकांत कविता को कविता मानने से इंकार करते हुए कहा कि यह वास्तव में कवि की अक्षमता है। जो लोग अतुकांत कविता के पक्ष में हैं, वास्तव में उनके पास विचारों और भावों की कमी है जिससे वे गद्य या निबंध नहीं लिख पाते हैं इसलिए वे अपने भावों को कविता का रूप देते हैं। कुछ शब्दों के संयोजन को कविता कहना ठीक नहीं है। उन्होंने रामायण, रामचरित मानस और महाभारत का उल्लेख करते हुए कहा कि विश्व के समस्त महान ग्रंथ गेय और लय में हैं।
सोशल मीडिया के महत्व को स्वीकार करते हुए यादव ने कहा कि इससे श्रोताओं की त्वरित प्रतिक्रिया प्राप्त होती है और दायरा बढ़ता है। इंटरनेट ने एक व्यापक फलक उपलब्ध कराया है और इसका इस्तेमाल किया जाना चाहिए। वह स्वयं अपने रचनाओं के प्रस्तुतीकरण के लिए साहित्यिक वेबसाइट का इस्तेमाल करते हैं। भारतीय भाषाओं को देवनागरी लिपि में लिखे जाने का प्रयास करना अच्छा है। इससे दूसरी भाषा का दायरा भी बढ़ेगा और सम्प्रेषणता में वृद्धि होगी। फिजी और मॉरीशस में हिन्दी को रोमन लिपि में लिखने के प्रचलन को खराब बताते हुए कहा कि इससे अंत में भाषा और संस्कृति को नुकसान होगा। यादव का एक गक़ाल संग्रह 'उसी के नाम' वर्ष 2018 में प्रकाशित हुआ। इसके दो संस्करण प्रकाशित हो चुके हैं। उन्होंने प्रशासनिक अधिकारियों के गक़ाल संग्रह 'इज्तिराब' का संपादन भी किया है। वह लंबे समय तक आकाशवाणी और दूरदर्शन से भी जुड़े रहे हैं। हिन्दी, अंग्रेजी और उर्दू भाषा पर समान अधिकार रखने वाले यादव ने लखनऊ विश्वविद्यालय से स्नातक और एमबीए की डिग्री प्राप्त की है और मूल रूप से उत्तर प्रदेश के फर्रूखाबाद में उनका पैतृक आवास है। उन्हें साहित्य के क्षेत्र में सम्मान भी प्राप्त हुए हैं। इनमें डॉ. इकबाल उर्दू अवार्ड 2014, डॉ. आसिफ बरेलवी अवार्ड 2014, दुष्यंत कुमार सम्मान 2015 और सृजन साहित्य सम्मान आदि शामिल है।