
सुप्रीम कोर्ट के न्यायाधीश संदीप मेहता ने राजस्थान हाईकोर्ट के निवर्तमान मुख्य न्यायाधीश (एसीजे) संजीव प्रकाश शर्मा के खिलाफ देश के प्रधान न्यायाधीश (सीजेआई) सूर्यकांत को एक और पत्र लिखा है। यह उनका चौथा पत्र है, जिसमें न्यायाधीश शर्मा की मनमानी कार्यप्रणाली पर लगाए गए आरोपों के साथ दस्तावेज और साक्ष्य भी पेश किए गए हैं।
उधर, निवर्तमान मुख्य न्यायाधीश संजीव प्रकाश शर्मा ने चौथे पत्र में लगाए आरोपों को लेकर राजस्थान पत्रिका से कहा कि इस पत्र सहित सभी पत्रों का जवाब पेश कर पक्ष सक्षम स्तर पर रखा जा चुका है। उन्होंने कहा कि वे पहले ही स्पष्ट कर चुके हैं कि सभी आरोप गलत और बेबुनियाद हैं।
जानकारी में आया है कि न्यायाधीश मेहता ने अपने चौथे पत्र की कॉपी राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू के साथ ही सुप्रीम कोर्ट के न्यायाधीश विक्रम नाथ, न्यायाधीश बी.वी. नागरत्ना, न्यायाधीश एम.एम. सुंदरेश और न्यायाधीश पी.एस. नरसिम्हा को भी भेजी है। इससे पहले न्यायाधीश मेहता ने सीजेआई को 2 अगस्त, 10 अगस्त और 17 अगस्त को भी पत्र भेजे थे। इनकी जानकारी मीडिया में आने के बाद सीजेआई ने 26 अगस्त को स्पष्ट किया था कि मामले संज्ञान में आए हैं और कार्रवाई के संबंध में निर्धारित प्रक्रिया अपनाई जाएगी।
न्यायाधीश मेहता ने 30 अगस्त को लिखे पत्र में राजस्थान हाईकोर्ट एडवोकेट्स एसोसिएशन, जोधपुर की ओर से 19 दिसंबर 2025 को सीजेआई को भेजे गए प्रतिवेदन का हवाला दिया है। एसोसिएशन ने कार्यवाहक सीजे की कार्यशैली पर गंभीर आपत्ति जताते हुए बेंच-बार संबंधों में खटास और हाईकोर्ट में लंबे समय से स्थायी मुख्य न्यायाधीश नहीं होने से आ रही समस्याओं का मुद्दा उठाया था। पत्र में बार की गुहार पर ध्यान नहीं दिए जाने से न्यायिक संस्था को नुकसान पहुंचने की आशंका जताई गई है।
पत्र में एक महिला न्यायिक अधिकारी के मोबाइल फोन पर अश्लील तस्वीरें दिखाने से जुड़े मामले का भी जिक्र है। इस शिकायत की जांच के लिए तीन महिलाओं सहित हाईकोर्ट के चार न्यायाधीशों की कमेटी गठित की गई थी। न्यायाधीश मेहता ने 21 मई और 9 जुलाई को कमेटी की बैठकों के दस्तावेजों का हवाला देते हुए आरोप लगाया कि एसीजे ने जांच प्रक्रिया में सीधा हस्तक्षेप किया और कमेटी के रिकॉर्डों को गोपनीय नहीं रहने दिया, जिसके कारण कमेटी ने जांच जारी रखने से इनकार कर दिया। पत्र में आरोपी अधिकारी के खिलाफ चल रही जांच की गोपनीयता का उल्लंघन होने का भी आरोप लगाया गया है।
न्यायाधीश मेहता का आरोप है कि 25 अगस्त को एसीजे ने अपनी शक्तियों का प्रयोग करते हुए हाईकोर्ट स्टाफ सेवा नियम, 2002 में संशोधन कर कुछ पदों के वेतनमान बढ़ाए और नियुक्तियों में कुछ विवेकाधीन शक्तियां अपने पास रख लीं। पत्र में आदेश पिछली तारीख में जारी होने का अंदेशा जताया है, क्योंकि आदेश में 25 अगस्त की तारीख है और प्रतियां संबंधित अधिकारियों को 2, 10 व 17 अगस्त के उनके पत्र सार्वजनिक होने के बाद 29 अगस्त को भेजी गईं। इसके अलावा सीनियर चौफर ग्रेड- प्रथम और चीफ चौफर जैसे पदों के संबंध में भी प्रावधानों में संशोधन फुल कोर्ट की सहमति के बिना ही किए गए।
पत्र में एक और गंभीर प्रकरण का हवाला दिया गया है, जो 28 अगस्त 2026 को राज कुमार अत्री नामक व्यक्ति की ओर से बूंदी जिले के रैण गांव की 324 बीघा कृषि भूमि से संबंधित विवाद को लेकर सीजेआई व सुप्रीम कोर्ट के सभी न्यायाधीशों को भेजे गए पत्र पर आधारित है। पत्र में इस विवाद के संबंध में कार्यवाहक मुख्य न्यायाधीश की भूमिका पर सवाल उठाते हुए कहा है कि रघुवीर सिंह अत्री से संबंधित मामले को लेकर जिला न्यायाधीश अजय शुक्ला का रिटायरमेंट से सात माह पूर्व श्रम न्यायालय में तबादला कर दिया गया और अतिरिक्त जिला एवं सत्र न्यायाधीश मीनाक्षी मीणा को बाड़मेर भेज दिया गया।
न्यायाधीश मेहता ने पत्र में कहा है कि गत 26 अगस्त को सीजेआई कार्यालय से जारी प्रेस बयान में सिटिंग जज के खिलाफ आरोपों को स्थापित संस्थागत तंत्र के माध्यम से ही निपटाए जाने की बात कही गई, लेकिन अब तक ठोस कदम नहीं उठाए जाने से जस्टिस शर्मा को कथित मनमानी जारी रखने का मौका मिल रहा है। इसका हवाला देकर जस्टिस शर्मा को न्यायिक व प्रशासनिक कार्यों से दूर रखने का आग्रह किया है।
जस्टिस संदीप मेहता
न्यायाधीश संदीप मेहता ने इससे पहले 2, 10 और 17 अगस्त को सीजेआई को तीन अलग-अलग पत्र लिखे। इनमें राजस्थान के एसीजे शर्मा पर कई आरोप लगाए।
सीजेआई सूर्यकांत
26 अगस्त: घटनाक्रम को लेकर स्पष्टीकरण जारी किया, जिसमें पत्र मिलने की स्वीकारोक्ति की और कहा- आरोपों को लेकर जांच की एक निर्धारित प्रक्रिया होती है।
एसीजे संजीव प्रकाश
2 सितंबर: न्यायाधीश शर्मा ने मीडिया को लिखित अपना पक्ष भेजकर धैर्य बनाए रखने की अपील की। कहा- अपना पक्ष सीजेआई के सामने रखा है।
पूर्व सीजेआई गवई
5 सितंबर: जयपुर में एक कार्यक्रम के दौरान कहा कि न्यायपालिका में विवाद संस्था स्तर पर सुलझें, पत्र सार्वजनिक करना सही नहीं।