
जयपुर. मार्गशीर्ष कृष्णपक्ष अष्टमी को भगवान कालभैरव का प्राकट्यपर्व मनाया जाता है। कालभैरव को शिव का पंचम रुद्रावतार माना जाता है। इस संबंध में शिवपुराण में स्पष्ट उल्लेख किया गया है कि भैरव ही पूर्ण रूप से जगतकल्याण करने वाले 'शंकर' हैं। ये दंडनायक कहलाते हैं जिनकी पूजा से घर में नकारात्मक ऊर्जा खत्म हो जाती है।
ज्योतिषाचार्य पंडित सोमेश परसाई बताते हैं कि भैरव के अनेक रूप हैं। ब्रह्मवैवर्त पुराण में आठ भैरवों के नामों का उल्लेख करते हुए उनकी साधना का विधान बताया गया है। ब्रह्मवैवर्त पुराण के अनुसार संहारभैरव, महाभैरव, असितांगभैरव, कालभैरव, रुद्रभैरव, क्रोधभैरव, चंद्रचूड़भैरव तथा ताम्रचूड़भैरव नामक भैरव है। इन सब भैरवों के अलग-अलग प्राकट्य हुए हैं।
वर्तमान समय में सामान्यत: श्रीकालभैरव व श्रीबटुक की पूजा-अर्चना ही की जाती है। कई भक्त श्रीबटुक भैरव को श्रीकालभैरव का ही सात्विक रूप मानते हैं। कालभैरव तामसपूर्ण हैं इसलिए आमतौर पर लोग इनके पूजन—अर्चन से डरते भी हैं। दरअसल शिव के क्रोध से प्रकट होने के कारण इनका स्वभाव उग्र माना जाता है।
श्रीबटुक भैरव और श्रीकालभैरव की साधना त्वरित फलदायक होती है, इसमें कोई संदेह नहीं है. ये अपने उपासकों को कष्ट से तत्काल मुक्ति देते हैं। आपराधिक प्रवृत्तियों पर नियंत्रण करने के लिए श्रीकालभैरव पूजा फलदायी होती है। भैरव पूजा करने से भूत-प्रेत, जादू-टोने, मारण, विद्वेषण, मोहन, उच्चाटन जैसी क्रियाएं फलीभूत ही नहीं होतीं।