
- ‘सेंटर ऑफ एक्सीलेंस’ सिर्फ नाम, व्यवस्था सामान्य से खराब
नागौर. ग्रामीण छात्रों को अंग्रेजी माध्यम और गुणवत्तापूर्ण शिक्षा देने के उद्देश्य से प्रदेश में करीब 15 साल पहले स्थापित की गईं स्वामी विवेकानन्द राजकीय मॉडल स्कूल अब ‘सेंटर ऑफ एक्सीलेंस’ के नाम तक सिमटते दिख रहे हैं। स्कूलों में संसाधनों और स्टाफ की कमी के साथ प्रशासनिक समस्याएं भी हैं। स्थिति यह है कि प्रत्येक स्कूल में प्राचार्य से लेकर कनिष्ठ सहायक तक करीब 35 पद स्वीकृत होने के बावजूद कई मॉडल स्कूलों में लगभग आधे पद रिक्त हैं। खासकर शिक्षकों के पद खाली होने से पढ़ाई प्रभावित हो रही है।
कलक्टर स्तर की मॉनिटरिंग जरूरी
मॉडल स्कूलों की नियमित समीक्षा के लिए जिला कलक्टर की अध्यक्षता में हर माह परफॉर्मेंस रिव्यू मीटिंग की आवश्यकता महसूस की जा रही है। दरअसल, कलक्टर केंद्रीय विद्यालय और नवोदय विद्यालय की तरह मॉडल स्कूलों के भी चेयरमैन होते हैं। ऐसे में उनकी नियमित समीक्षा और सीधे हस्तक्षेप के बिना शिक्षण व्यवस्था को अपेक्षित स्तर तक ले जाना मुश्किल है।
ऑफिसों में कार्मिक भेजने से स्कूलों की व्यवस्था बाधित
मॉडल स्कूल राज्य में चुनिंदा 134 विद्यालयों का नेटवर्क है, ऐसे में इन स्कूलों से कार्मिकों को कार्यालयों में लगाने जैसे आदेश विद्यालयों की मूल व्यवस्था को प्रभावित करते हैं। विभागीय स्तर पर ब्लॉक स्तर के मॉडल स्कूलों को बाधित नहीं करने के निर्देश होने के बावजूद मॉनिटरिंग की कमी के कारण स्थिति बदल जाती है।
वर्जन...
मॉडल स्कूल केवल विद्यालय नहीं, बल्कि ग्रामीण प्रतिभाओं के सपनों को आकार देने की प्रयोगशाला है। यदि इन विद्यालयों की व्यावहारिक समस्याओं का समय रहते समाधान कर दिया जाए तो ये संस्थान देश के श्रेष्ठ शिक्षण संस्थानों की बराबरी करने की क्षमता रखते हैं।
- भंवरलाल जाट, प्राचार्य, मॉडल स्कूल, मूण्डवा