जयपुर। मुख्यमंत्री आयुष्मान आरोग्य बीमा (मां) योजना में नवजात शिशुओं की देखभाल से जुड़े बदलाव विशेषज्ञ कमेटी की रिपोर्ट के बाद सवालों के घेरे में आ गए हैं। रिपोर्ट के अनुसार नवजात देखभाल को टर्सरी स्तर से हटाकर सेकंडरी स्तर पर लाना, इलाज की सीमा 5 लाख से घटाकर 50 हजार करना और डीसीएच व […]
जयपुर। मुख्यमंत्री आयुष्मान आरोग्य बीमा (मां) योजना में नवजात शिशुओं की देखभाल से जुड़े बदलाव विशेषज्ञ कमेटी की रिपोर्ट के बाद सवालों के घेरे में आ गए हैं। रिपोर्ट के अनुसार नवजात देखभाल को टर्सरी स्तर से हटाकर सेकंडरी स्तर पर लाना, इलाज की सीमा 5 लाख से घटाकर 50 हजार करना और डीसीएच व एमडी (पीडियाट्रिक) डॉक्टरों को बाहर करना राजस्थान में नवजात मृत्यु दर (एमएमआर) को कम करने की बजाय बढ़ाने का खतरा पैदा कर रहे हैं।
जानकारी के मुताबिक कमेटी ने अपनी रिपोर्ट काफी पहले तैयार कर दी। लेकिन इसके सुझावों पर भी अमल नहीं किया गया है। रिपोर्ट के मुताबिक राजस्थान देश का सबसे बड़ा राज्य है, जहां हर साल करीब 16 लाख नवजात जन्म लेते हैं। एसआरएस के अनुसार राज्य की नवजात मृत्यु दर अभी भी चिंता का विषय है। ऐसे में नवजात देखभाल जैसी जीवन रक्षक और गंभीर चिकित्सा सेवा को सेकंडरी स्तर पर सीमित करना जमीनी सच्चाई से सीधा टकराव है। विशेषज्ञों के अनुसार नवजात देखभाल स्वभाव से ही टर्सरी स्तर की सेवा है, जिसमें एनआईसीयू, वेंटिलेटर और उच्च विशेषज्ञता की जरूरत होती है।
रिपोर्ट में यह
- डीसीएच को बाहर करना सबसे बड़ी चूक : डिप्लोमा इन चाइल्ड हेल्थ (डीसीएच) डॉक्टरों को नवजात देखभाल से बाहर करना बड़ी चूक है। इन्हें राज्य सरकार, राजस्थान मेडिकल काउंसिल और नेशनल मेडिकल कमीशन से नवजात और बाल रोग दोनों में प्रैक्टिस की अनुमति है। ये नीट के जरिए मेरिट पर चयनित होते हैं। वर्षों से सरकारी व निजी क्षेत्र में नवजात देखभाल की रीढ़ बने हुए हैं।
- राजस्थान के किसी भी सरकारी मेडिकल कॉलेज में डीएम नियोटोलॉजी का कोर्स संचालित नहीं हो रहा। ऐसे में पूरे राज्य की नवजात देखभाल का भार एमडी, डीएनबी और एमसीएच डॉक्टरों पर ही है। निजी क्षेत्र में मौजूद 2-4 डीएम विशेषज्ञ 16 लाख नवजातों की जरूरतें पूरी नहीं कर सकते। इसके बावजूद डीसीएच को मां योजना से बाहर करना, कमेटी के शब्दों में, “व्यावहारिक रूप से अव्यवहारिक” फैसला है।
- कमेटी ने इलाज की सीमा घटाने को भी वास्तविकता से परे बताया है। रिपोर्ट में कहा गया है कि गंभीर नवजात मामलों में कुछ ही दिनों का एनआईसीयू खर्च 1-2 लाख तक पहुंच जाता है। ऐसे में 50 हजार की सीमा तय करना इलाज नहीं, बल्कि आंकड़ों की खानापूर्ति है। कमेटी ने सिफारिश की है कि पैकेज सीमा को तत्काल 5 लाख तक बहाल किया जाए, जैसा पहले था।
बीमा कंपनियों के भरोसे नीति
रिपोर्ट में यह भी सामने आया है कि स्पष्ट सरकारी आदेशों के अभाव में बीमा कंपनियां और रासा अपने स्तर पर नियमों की व्याख्या कर रही हैं। नतीजतन अस्पतालों के क्लेम अटक रहे हैं। डॉक्टर भ्रम में हैं और नवजातों का इलाज देरी का शिकार हो रहा है। कमेटी के अनुसार डीसीएच पात्रता पर स्पष्ट आदेश जारी कर सभी एजेंसियों को सख्ती से पालन के निर्देश दिए जाने चाहिए।
ये नुकसान
- नवजात देखभाल स्वभाव से ही जीवन रक्षक और क्रिटिकल होती है। इसमें एनआईसीयू, वेंटिलेटर, प्रशिक्षित स्टाफ और विशेषज्ञ निगरानी जरूरी होती है। सेकेंडरी स्तर पर यह सुविधाएं सीमित होती हैं, जिससे गंभीर मामलों में देरी और मौत का खतरा बढ़ता है।
- गंभीर नवजात मामलों में कुछ ही दिनों का एनआईसीयू खर्च 1-2 लाख तक पहुंच जाता है। 50 हजार की सीमा इलाज के बजाय औपचारिकता है। गरीब परिवारों को या तो इलाज छोड़नापड़ता है या कर्ज में जाना पड़ता है।
- डीसीएच डॉक्टरों को बाहर करना ग्रामीण और दूरस्थ इलाकों में इलाज बंद करने जैसा है।
- स्पष्टता के अभाव में बीमा कंपनियां और रासा अपने-अपने नियम चला रही हैं। जिससे क्लेम रिजेक्ट, अस्पताल परेशान और नवजात इलाज में देरी हो रही है।