जयपुर

शंकर महादेवन ने गुनगुनाया मां, तो श्रोताओं के बह निकले आंसू

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shankar mahadevn and prasun joshi
शंकर महादेवन ने गुनगुनाया मां, तो श्रोताओं के बह निकले आंसू

पुष्पेन्द्र शर्मा, अनुराग त्रिवेदी / जयपुर. सुरों के दो दिग्गज मंच पर मौजूद थे, एक वो जो इन्हें कलम से कागज पर उतारते हैं, दूसरे वो जो इन्हें सुरों के सांचे में ढालकर लोगों के दिलों पर राज करते हैं। जब संगीत के ये महारथी एक मंच पर साथ हों, तो श्रोताओं का संगीत के समुंदर में डूब जाना लाजिमी है। राजस्थान पत्रिका पैट्रनशिप एमटीवी इंडिया म्यूजिक समिट के दूसरे दिन शनिवार को मंच पर एक ऐसा माहौल बना, जिसने श्रोताओं की आंखें नम कर दीं। संगीत की जुगलबंदी का यह अनोखा मंच सजाया गीतकार प्रसून जोशी और सुरों के 'शंकर' शंकर महादेवन ने।

म्यूजिक समिट की खूबसूरती को ओढ़कर आए कलाकारों ने जैसे ही सुरों के धागे खोले, संगीत की पहेली में उलझे श्रोता गद्गद् हो उठे। द की नोट सेशन में शंकर महादेवन के साथ सुरों की चर्चा करने प्रसून जोशी मंच पर थे। शंकर के बचपन से शुरू हुई बात संगीत के जीवन की जवानी तक पहुंची। जैसे-जैसे समय बीत रहा था। श्रोता गाने और घराने की बारीकियां समझते जा रहे थे।

सेशन: संगीत को सही माध्यम के साथ प्रस्तुत करोगे तो यह जरूर सुना जाएगा
गीतकार प्रसून जोशी ने शंकर महादेवन से पूछा क्या आप बचपन से ही सिंगर बनना चाहते थे? शंकर ने कहा कि हमारे कल्चर में वो बात है कि कोई ना कोई कुछ ना कुछ सीखता है। लगभग साढे तीन साल की उम्र में किसी रिश्तेदार के यहां हारमोनियम पर मैंने 'चल चल चल मेरे साथी' गाना गाया। पैरेंटृस ने सोचा कि इसका म्यूजिक में इंटरेस्ट है तो उन्होंने मुझे कर्नाटक क्लासिकल की तालीम दिलाना शुरू कर दिया। मिडिल क्लास फैमिली के सपने डॉक्टर-इंजीनियर पर आकर अटक जाते हैं, इसलिए मैंने भी इंजीनियरिंग की। लेकिन, मैंने सोच लिया था कि म्यूजिक में कुछ करना है, गुलाम अली, पं जसराज, श्रीनिवास अय्यर, शुभलक्ष्मी जी से इंस्पायर हुआ। फिर मैंने इसे कॅरियर के तौर पर चुन लिया।

शंकर ने कहा कि उनका हमेशा यह प्रयास रहता है कि चाहे क्लासिकल हो या बॉलीवुड ज्यादा से ज्यादा लोगों तक पहुंचना चाहिए। मितवा गाने को लेकर यही प्रयोग किया और इसमें क्लासिकल डाल दिया और यह सुपरहिट साबित हुआ। मेरा मानना है कि जब आप संगीत को सही माध्यम, रंग और प्रस्तुति के साथ प्रस्तुत करोगे तो यह जरूर सुना जाएगा।

शब्दों-धुन की आपस में थामी अंगुली

प्रसून ने चर्चा को आगे बढ़ाते हुए कहा कि हम जैसे गीतकार को गायक से इतनी छूट चाहिए होती है जिससे गीत-कविता का तारतम्य न टूटे। मुझे खुशी है कि शंकर ने मुझे मेरे गानों में यह छूट दी है। प्रसून ने कहा कि एक बेहतरीन गीत वही होता है जिसमें आप ये पता न लगा पाओ कि पहले शब्द लिखे गए थे या पहले धुन रची गई थी। शंकर ने मेरे शब्दों की अंगुली थाम ली और मैंने इनकी धुन की। शंकर ने कहा कि कोई भी गाना हो, उसके शब्द जिस दिशा में जा रहे हैं, उसे महसूस कर अपने सुर लगाना ही संगीतज्ञ की कला है। शंकर ने कहा कि कजरारे-कजरारे गाना कीर्तन पर आधारित है। इस तरह के भजन में एक—एक लाइन का कोरस चलता है। जब मैंने इससे इंस्पायर होकर यह गाना रिलीज किया तो दूसरे दिन मेरे पास पं जसराज जी का फोन आया।

मैं डर गया कि बड़ी गलती तो नहीं हो गई है, लेकिन उन्होंने कहा कि शाम से ही मैं यह गाना गुनगुना रहा हूं, तो बड़ी खुशी हुई। शंकर ने म्यूजिक में टेक्नोलॉजी, अपने दो बेटों के साथ जुगलबंदी और अपनी ऑनलाइन म्यूजिक एकेडमी के बारे में भी चर्चा की। जैसे ही सेशन के समापन का समय आया तो प्रसून ने मां पर अपना लिखा गाना शंकर से सुनाने की गुजारिश की। शंकर ने माइक उठाया तो श्रोताओं में रोमांच बढने लगा। 'दिल ही दिल में घबराता हूं मैं मांÓ लाइन पर तो जैसे श्रोताओं की दिलों की धडकनें बढ़ गई। मजबूत दिलों ने खुद को खूब रोकना चाहा लेकिन शंकर के सुरों के आगे आंसुओं की धारा बह निकली।

Published on:
13 Oct 2018 10:13 pm
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