जयपुर

आत्मा के स्वाभाविक धर्म : दशलक्षण धर्म हैं विश्वशांति का उद्घोषक

जैन धर्म अनादि, अनंत, शाश्वत, सनातन धर्म है। इस युग के जैन धर्म प्रवर्तक वर्तमान अवसर्पिणी काल के प्रथम तीर्थंकर आदिनाथ भगवान है।

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Aug 27, 2025

जयपुर। जैन धर्म अनादि, अनंत, शाश्वत, सनातन धर्म है। इस युग के जैन धर्म प्रवर्तक वर्तमान अवसर्पिणी काल के प्रथम तीर्थंकर आदिनाथ भगवान है। जैन धर्म के तीन प्रमुख पर्व वर्ष में तीन बार मनाए जाते है। 1) षोडशकारण भावना पर्व का पालन करने से तीर्थंकर प्रकृति का आश्रव (बंधन) होता है। 2) अष्टान्हिका पर्व सिद्धों की भक्ति का पर्व मनाने से आत्म शुद्धि होती है एवं 3) दशलक्षण पर्व- इस पर्व को बड़े ही भक्तिभाव के साथ मनाया जाता है। भाद्रपद में आने वाले इस पर्व के दौरान आत्मा के दस धर्मों की विशेष आराधना करते है। दस धर्मों का पालन करना साधकों, तपस्वियों के मूल गुण है। श्रावकगण भी आत्म कल्याण के दस धर्मो का पालन करने की चेष्टा करते है। दशलक्षण पर्व आत्मानुभूति का मार्ग प्रशस्त करता है, इसको पर्वराज भी कहा जाता है। जैन धर्म में इस पर्व का महत्वपूर्ण स्थान है।

दशलक्षण धर्म पर्व, जैसा कि नाम से ही ज्ञात होता है, में दस धर्मो की पूजा, आराधना एवं पालना की जाती है, वे दस धर्म इस प्रकार है
1) उत्तम क्षमा : दूसरों को क्षमा करना और स्वयं की गलती के लिए दूसरों से क्षमा मांगना।
2) उत्तम मार्दव : विनयशील, विनम्र, कोमल भाव रखना।
3) उत्तम आर्जव : मन की शुद्धता, सरलता बनाए रखना एवं छल-कपट से दूर रहना।
4) उत्तम शौच : पवित्र भावना एवं मन, वचन और शरीर की शुद्धि रखना ।
5) उत्तम सत्य : सच बोलना और सच का पालन करना ही सत्य धर्म नहीं है। आत्मा से जो शांति स्वरुप वीतरागता उत्पन्न होती है, वहीं सत्य धर्म है।
6) उत्तम संयम : अपनी इंद्रियों पर नियंत्रण अर्थात आत्म नियंत्रण प्राप्त करना।
7) उत्तम तप : आंतरिक एवं बाह्य 12 प्रकार के तप धारण कर कर्मों का नाश करना।
8) उत्तम त्याग : वास्तविकता में त्याग से प्राप्ति का मार्ग प्रशस्त होता है, देने के सुख का अनुभव होता है।
9) उत्तम अकिंचन: वस्तुओं और व्यक्तियों से आसक्ति न रखना।
10 ) उत्तम ब्रह्मचर्य : अपने आत्म स्वरूप में रमण करना।

इन दस धर्म में से प्रथम तीन लक्षण भाव धर्म, आगे के पांच लक्षण मोक्ष मार्ग प्राप्ति के उपाय एवं अंतिम दो लक्षण धर्म का सार है।

इनकी पालना कर आत्म शुद्धि की जाती है एवं आत्मानुशासन की ओर अग्रसर होते है। इन सभी धर्मों के अंतर्गुण नाम से ही स्वत: स्पष्ट है। ये सभी धर्म एक दूसरे के पूरक है। किसी भी एक धर्म की पालना, साधना करने से शेष सभी धर्म आत्मसात हो जाते है एवं साधक के जीवन का अंग बन जाते है। उत्तम शब्द सम्यक् दर्शन के साथ इन गुणों को प्राप्त करने के अर्थ में लिया गया है। आत्मा के शुद्ध स्वरूप को प्रकट करने के कारण उत्तम धर्म कहा जाता है एवं उत्तम धर्म ही मोक्ष प्राप्ति में सहायक होता है। यह पर्व जिन मंदिरों में विशेष पूजा के साथ बड़े ही भक्तिभाव से मनाया जाता है। इस पर्व के दौरान जैन धर्मावलंबी सामान्यतः व्यापार एवं नौकरी से अवकाश पर रहते है। इन दस दिनों में जिन अभिषेक, शांतिधारा, पूजा, पाठ, स्वाध्याय यथावत करते है। प्रतिदिन नित्यनियम पूजा के साथ सभी दस धर्मो की पूजा विधान है, किंतु महत्ता की दृष्टि से प्रत्येक दिन क्रमशः अलग अलग धर्म के गुणों का विशेष वर्णन सूक्ष्मतम रूप में पूजा करने के साथ आत्मसात् किया जाता है।

इस पर्व में जैन धर्मावलंबी साधना के मार्ग को अपनाते हुए व्रत, उपवास रखते है एवं कई भक्त दस दिनों तक अन्न जल ग्रहण ही नहीं करते है एवं इस पर्व में भोजन करने वाले सात्विक भोजन ही सीमित मात्रा एवं आवृति में ग्रहण करते है।श्रावकगण इस समय का सदुपयोग त्याग, तपस्या, आराधना, साधना का मार्ग अपना कर करते है। यह पर्व अपनी इंद्रियों पर नियंत्रण, आत्मशुद्धि एवं कर्मों का क्षय कर मोक्ष मार्ग प्रशस्त करने के लिए मनाया जाता है। यह पर्व यथाशक्ति दान देने की प्रेरणा भी देता है। इस पर्व के अंत में जाने अनजाने में की गई गलतियों के लिए क्षमावाणी पर्व मनाया जाता है। जीवन को सर्वोत्तम तरीके से जीने की कला सिखाने वाले दस धर्मो को व्यवहार में उतारने का पर्व दशलक्षण महापर्व है।

दस धर्म की पालना क्यों ?

भारतीय संस्कृति विश्व में निराली है। यहां हर धर्म समाज में सद्भावना बनी रहती है। यहां के त्यौहार तार्किक आधार पर मनाए जाते है। उनको अपनाने में प्राणी मात्र के साथ समाज एवं राष्ट्र कल्याण निहित होता है। जीवन किसी भी प्रकार से जिया जा सकता है, लड़ाई झगड़ा करके, सामंजस्य के साथ या सद्भावना यानी एक दूसरे का मंतव्य समझते हुए। भाद्रपद मास में आने वाला दशलक्षण पर्व में भी बहुत सारे संदेश छिपे हुए है। दस दिन तक लगातार जब व्यक्ति भक्ति, पूजा पाठ, स्वाध्याय एवं नियमित रूप से आत्म चिंतन, ध्यान करता है, शुद्ध एवं सात्विक भोजन वह भी सीमित मात्रा में ग्रहण करता है तो इसका दीर्घकालीन प्रभाव पड़ता है। आध्यात्मिकता जीने की एक कला है। इस दौरान मुनिसंघों के सानिध्य में विभिन्न स्थानों पर आध्यात्मिक, ध्यान शिविर लगाए जाते है। शिविरार्थी इस दौरान उसी स्थान पर रहते है। इन शिविरों में सात्विक नियमों का पालन करने वाला कोई भी व्यक्ति भाग ले सकता है। इस पर्व में सभी दश धर्म की विवेचना एवं पालना की जाती है। कोई भी नास्तिक या किसी भी धर्म का मानने वाला आस्तिक भी इन धर्मों से विमुख नहीं हो सकता है। तात्पर्य यह है कि ये धर्म शाश्वत है, सर्व कालीन है।

व्याप्त समस्याएं

एक दूसरे से अवांछित होड़ में परिवार में कई समस्याएं जन्म लेने लगती है। बोल चाल बंद होना, सामंजस्य का आभाव, आर्थिक तंगी, नशा करना, स्वास्थ्य संबंधी समस्याएं, हिंसा, विवाह विच्छेद, बच्चों के पालन-पोषण से जुड़ी समस्याओं का सामना करना पड़ रहा है। इसी तरह समाज को भी निर्धनता, अशिक्षा, बेरोजगारी, भ्रष्टाचार, जनसंख्या वृद्धि असमानता, आतंकवाद, मादक पदार्थों का सेवन, पर्यावरण प्रदूषण बाल विवाह व दहेज प्रथा आदि समस्याएँ समाज के एक बड़े वर्ग को प्रभावित करती हैं।

अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर व्याप्त प्रमुख समस्याओं में सीमा विवाद, आतंकवाद, टैरिफ वार, वर्चस्व स्थापित - महाशक्ति बनने का जुनून, जलवायु परिवर्तन, महामारी, आर्थिक असमानता, ऋण संकट आदि से जूझ रहा है।

कल्याणकारी राज्य की स्थापना

दस धर्म प्रत्येक व्यक्ति को अपने आत्मिक विकास का अवसर प्रदान करता है। प्रत्यके व्यक्ति द्वारा इन धर्मों की पालना करना कठिन नहीं है। धर्म का अर्थ है धारण करने योग्य, जिनसे हमारे कर्मों की निर्जरा होती है एवं हमारी आत्मा परम पवित्र बनती है। इन्हें अपनाने से हमारा आत्म विश्वास जागृत होता है क्यों हम किसी के भी प्रति बदले की भावना नहीं रखते है, ज्यादा पाने की इच्छा नहीं रहती है, करुणा के भाव के कारण हम एक दूसरे का सहयोग करते है। ऐसे विचारों से मानसिक स्थिति सुदृढ़ बनती है एवं काया भी निरोगी बनी रहती है, जो हमे सुख की अनुभूति देता है। इस पर्व के दौरान विभिन्न संस्थाओं द्वारा आध्यात्मिक शिविर लगाया जाता है, जिनमें लाखों व्यक्ति सम्मिलित होकर सुख की अनुभूति करते है।

दस दिन तक एक व्यक्ति स्वयं में व्याप्त सद्गुणों को अपना लेता है तो ये गुण परिवार से समाज में एवं समाज से राष्ट्रीय एवं अंतरराष्ट्रीय स्तर तक इनका फैलाव हो जाता है। परिवर्तन एवं सुधार के लिए मात्र एक व्यक्ति की आवश्यकता होती है। एक परिवार में, समाज में एवं अंतरराष्ट्रीय स्तर पर व्याप्त विरोधाभास मात्र एक व्यक्ति द्वारा दूर हो सकता है। अपने समय में एक तीर्थंकर द्वारा ही सबका उद्धार हो जाता है।


अहिंसक एवं क्षमा की प्रवृति दो देशों के बीच हजारों वर्षों से चली आ रही दुश्मनी दूर कर देती है। यूक्रेन - रूस, इजराइल -लेबनान, गाजापट्टी के बीच शांति का वातावरण तैयार हो रहा है। संवेदन शीलता पनप रही है। करुणा का भाव रखकर एक दूसरे के दुख दर्द को समझने लगे है।प्रकृति के अनुसार जीवन जीने की ओर बढ़ने लगे है। अध्यात्म ही हमे जीवन मरण से छुटकारा दिलाकर मोक्ष मार्ग की ओर ले जाता है। इन सबसे अपराधों का ग्राफ नीचे की ओर जाना शुरू हो जाएगा। सबमें भाईचारे की भावना विकसित होगी।आपस में सामंजस्य का अवसर मिलेगा। एक कल्याणकारी राज्य की स्थापना होगी।

संकलन
भागचंद जैन मित्रपुरा, अध्यक्ष अखिल भारतीय जैन बैंकर्स फोरम जयपुर

Published on:
27 Aug 2025 09:02 pm
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