
रायचूर. श्री वर्धमान स्थानकवासी जैन श्रावक संघ, रायचूर के तत्वावधान में डॉ. पदमचंद्र की सुशिष्या जैन समणी डॉ. सुयशनिधि एवं जैन समणी सुयोगनिधि के चातुर्मास के अंतर्गत प्रवचन श्रृंखला जारी है। विशाल धर्मसभा को संबोधित करते हुए समणी डॉ. सुयशनिधि ने कहा कि जैन धर्म भावप्रधान है और आहार केवल उदर-पूर्ति नहीं, बल्कि विवेक एवं साधना का विषय है। उन्होंने कहा कि श्रमण निर्ग्रंथ साधु-संतों को निर्दोष आहार का दान महाफलदायी होता है। शुद्ध भावना से किया गया दान आत्मा के उत्थान का मार्ग प्रशस्त करता है। साधु के लिए आहार संयम-साधना का माध्यम है, जबकि गृहस्थ के लिए जीवन-कर्तव्य का हिस्सा है। इसलिए आहार में विवेक, मर्यादा और निर्दोषता आवश्यक है। समणी डॉ. सुयशनिधि ने उत्तराध्ययन सूत्र के संदर्भ में आहार संबंधी एषणाओं तथा सावधानियों की चर्चा करते हुए उत्पादन के 16 और परिभोग के 10 दोषों का उल्लेख किया। उन्होंने ‘जीर्ण सेठ’ प्रसंग के माध्यम से द्रव्य-शुद्धि के साथ भाव-शुद्धि का महत्व समझाया।उन्होंने कहा कि "हम भोजन करने के लिए जी रहे हैं या जीने के लिए भोजन कर रहे हैं?" आहार शरीर की आवश्यकता और धर्म-साधना में सहायक होना चाहिए, स्वाद और आसक्ति की पूर्ति का साधन नहीं। कार्यक्रम में 22 अगस्त से प्रारंभ होने वाली नवकार आराधना तप की जानकारी दी गई। मंच संचालन पावन नाहर ने किया।