
हुब्बल्ली. जैन मरुधर संघ में चातुर्मास के लिए विराजित आचार्य दिव्येशचंद्र सागरसूरि ने ‘धर्मत्व प्रकरण’ ग्रंथ के आधार पर धर्मसभा को संबोधित करते हुए कहा कि धर्म का प्रवेशद्वार दया, पाप का प्रवेशद्वार अहंकार और आध्यात्मिक ज्ञान का प्रवेशद्वार सरलता है। साधना के मार्ग पर नमस्कार का विशेष महत्व है। उन्होंने कहा कि प्रत्येक तीर्थंकर परमात्मा देशना प्रारंभ करने से पहले पूर्ववर्ती तीर्थंकरों को स्मरण करते हुए संघ को नमस्कार करते हैं। शास्त्र में कहा गया है कि गुणों की प्राप्ति के लिए गुणवानों को नमस्कार करना आवश्यक है। व्यक्ति को नहीं, बल्कि उसके भीतर विद्यमान गुणों को नमन करना चाहिए। आचार्य दिव्येशचंद्र सागरसूरि ने कहा कि जब हमारी दृष्टि व्यक्ति, गच्छ, पक्ष या संप्रदाय तक सीमित हो जाती है, तब हम दोष देखने लगते हैं और गुणों से वंचित रह जाते हैं। व्यक्ति के बजाय गुणों पर दृष्टि रखने से जीवन में संतोष, समाधान और शांति का भाव विकसित होता है। उन्होंने कहा कि पक्षपात, स्वार्थ और अहंकार से किया गया नमस्कार सांसारिक बंधनों को बढ़ाता है, जबकि निष्पक्ष, निर्विकार और प्रशांत भाव से किया गया नमन मोक्षमार्ग को प्रशस्त करता है। तिरस्कार और पूर्वाग्रह नहीं, बल्कि संस्कार और विनम्रता के साथ नमस्कार करना चाहिए। उन्होंने श्रीकृष्ण वासुदेव के प्रसंग का उल्लेख करते हुए कहा कि उन्होंने 18 हजार साधु भगवंतों को संस्कारपूर्वक नमस्कार किया और आध्यात्मिक उन्नति का मार्ग प्रशस्त किया। नमस्कार केवल औपचारिकता नहीं, बल्कि अहंकार त्यागकर आत्मशुद्धि की दिशा में बढऩे का माध्यम है।