कांस्टेबल से सहायक उपनिरीक्षक और महकमे के चतुर्थ श्रेणी कर्मचारी तक इस अवकाश के हकदार होंगे।
पुुलिस बेड़े में नफरी की कमी और काम का दबाव जगजाहिर है। पुलिस के जवान से लेकर अफसर तक से उम्मीद की जाती है कि वह न केवल शारीरिक रूप से बल्कि मानसिक तौर से भी फिट हो। सब यह भी जानते हैं कि कम छुट्टियां, परिवार से दूरी और लंबी ड्यूटी जैसे खास कारण है, जो पुलिस के बर्ताव में नकारात्मक बदलाव लाते जा रहे हैं। राजस्थान में सवाईमाधोपुर की नवपदस्थपित पुलिस अधीक्षक ज्येष्ठा मैत्रेयी की इस पहल की सर्वत्र सराहना हो रही है जिसमें उन्होंने निर्देश दिए हैं कि अपने माता-पिता, स्वयं के, पत्नी अथवा बच्चों के जन्मदिन पर कोई पुलिसकर्मी अवकाश आवेदन करता है तो उसे स्वीकृत किया जाएगा। कांस्टेबल से सहायक उपनिरीक्षक और महकमे के चतुर्थ श्रेणी कर्मचारी तक इस अवकाश के हकदार होंगे। देखा जाए तो यह सामान्य प्रशासनिक आदेश मात्र ही नहीं, बल्कि पुलिस बल के भीतर मानवीय संवेदनाओं को सम्मान देने का सशक्त फैसला है।
जाहिर है, पुलिस नफरी में कमी के बावजूद पुलिस अधीक्षक ने यह महसूस किया है कि परिवार की खुशियों में शामिल होने का मौका देने से संबंधित कार्मिक ज्यादा उत्साह व मनोबल के साथ काम करेगा। यह सही है कि पुलिस का जनता के प्रति व्यवहार न्यायसंगत, संवेदनशील और मददगार होना चाहिए। पुलिस की कठिन ड्यूटी और उनकी पारिवारिक जिम्मेदारियों के बीच यह भी अध्ययन का विषय है कि आखिर आम आदमी के मन में पुलिस को लेकर नकारात्मक सोच क्यों रहने लगी है। क्यों थानों को 'सेवा मंदिर' बनाने और पुलिस को 'पब्लिक फ्रेंडली' बनाने के विचार फाइलों में ही दबकर रह जाते हैं। पुलिस जैसे जरूरी सुरक्षा बल में आखिर हर बार नफरी की कमी की शिकायतें क्यों रहती है? जाहिर है पुलिस का मनोबल बढ़ाने वाले सवाईमाधोपुर एसपी के इस एक फैसले से ही काम नहीं चलने वाला। यह समझना होगा कि जनता के प्रति संवेदनशील व्यवहार से ही जनता के मन में पुलिस के प्रति सम्मान बढ़ पाएगा।