
Dummy Candidate Case: बाड़मेर के एक परीक्षा केंद्र पर कथित तौर पर रंगे हाथ पकड़ी गई एक डमी परीक्षार्थी अदालत से बरी हो गई। गवाहों के पलटने और लचर अनुसंधान के कारण अभियोजन पक्ष की पूरी कहानी ताश के पत्तों की तरह ढह गई। अदालत में सरकारी पदों पर बैठे जिम्मेदार लोगों के बयानों में ऐसा विरोधाभास दिखा कि कोर्ट को आरोपी को दोषमुक्त करना पड़ा।
बड़ा सवाल यह है कि यदि सिस्टम के अंग ही जिम्मेदारी से पीछे हटेंगे, तो बेरोजगारों को न्याय कैसे मिलेगा। राजस्थान में भर्ती परीक्षाओं में डमी कैंडिडेट की 2 से 15 लाख में डील के खुलासे तो हुए लेकिन पुलिस की लचर जांच से आरोपी कोर्ट से दोषमुक्त हो रहे हैं।
भर्ती परीक्षाओं में डमी अभ्यर्थी बैठाने का यह कोई इकलौता मामला नहीं है। एसओजी की ओर से जून 2024 में गिरफ्तार पेपर लीक माफिया हनुमान मीणा ने खुलासा किया था कि उसने शिक्षक भर्ती-2022 और एलडीसी-2018 जैसी कई परीक्षाओं में डमी अभ्यर्थी बैठाने के बदले 2 से 15 लाख रुपए तक लिए थे। प्रदेश में पिछले वर्ष 115 से अधिक और इस वर्ष अब तक 60 से अधिक ऐसे मामले सामने आ चुके हैं, जिनकी एसओजी एफएसएल जांच करवा रही है।
केस ऑफिसर्स स्कीम और साइंटिफिक साक्ष्य जरूरी
मामलों में केवल गिरफ्तारी पर्याप्त नहीं होती। गवाह कई बार दबाव या लालच में बदल जाते हैं। ऐसे में 'केस ऑफिसर्स स्कीम' लागू कर सख्त निगरानी रखनी चाहिए। कोर्ट में केस मजबूत करने के लिए मौके के दस्तावेजी साक्ष्य, सीडीआर, बायोमैट्रिक, सीसीटीवी फुटेज और हस्ताक्षर परीक्षण की एफएसएल रिपोर्ट अनिवार्य की जानी चाहिए।
बी.एस. चौहान, विशेष लोक अभियोजक, एसओजी
गवाहों के पक्षद्रोही (होस्टाइल) होने पर भी एक सजग लोक अभियोजक मजबूत दस्तावेजी साक्ष्यों के दम पर सजा करवा सकता है। बार-बार सरकारी वकील (लोक अभियोजक) बदलने से केस पर बुरा असर पड़ता है। संवेदनशील और महत्वपूर्ण मामलों में विशेष लोक अभियोजक की स्थायी नियुक्ति ही फलदायी होती है।