जयपुर

नश्तर में आज : कमीशनखोरी का जाल

अस्पतालों में आईसीयू यानी गहन चिकित्सा इकाई में मरीज के भर्ती होने का मतलब है उसकी विशेष चिकित्सा उन्नत जीवन रक्षक उपकरणों का सपोर्ट देते हुए निरंतर मॉनिटरिंग के साथ की जाए। लेकिन जब मॉनिटरिंग करने वाले उपकरणों के नतीजों पर संदेह होने लगे तो भला कोई बेहतर उपचार की उम्मीद कैसे करे?
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Jun 29, 2026
Gajendra Singh Khimsar
मंत्री गजेन्द्र सिंह खींवसर व नए खरीदे गए मॉनिटर। फोटो: पत्रिका

हरीश पाराशर

अस्पतालों में आईसीयू यानी गहन चिकित्सा इकाई में मरीज के भर्ती होने का मतलब है उसकी विशेष चिकित्सा उन्नत जीवन रक्षक उपकरणों का सपोर्ट देते हुए निरंतर मॉनिटरिंग के साथ की जाए। लेकिन जब मॉनिटरिंग करने वाले उपकरणों के नतीजों पर संदेह होने लगे तो भला कोई बेहतर उपचार की उम्मीद कैसे करे? राजस्थान के सरकारी अस्पतालों की गहन चिकित्सा इकाइयों में लगाए गए मल्टीपैरा मॉनिटर कोई खुद चल कर वहां नहीं पहुंचे। बाकायदा उपकरणों की जांच के साथ सक्षम स्तर से अनुमोदन के बाद खरीद प्रक्रिया की गई होगी।

मॉनिटर की खरीद में हुए भ्रष्टाचार को तो सरकारी खरीद की ‘लाइलाज बीमारी’ माना जा सकता है। लेकिन हैरत की बात यह है कि शिकायत की अनदेखी कर इन मॉनिटरों को आईसीयू में लगा भी दिया गया। गहन चिकित्सा इकाई में भर्ती मरीजों का ब्लड प्रेशर, ऑक्सीजन सैचुरेशन और ईसीजी की रीडिंग गलत हो और डॉक्टर उसी के अनुरूप इलाज शुरू कर दे तो इससे बड़ा आपराधिक कृत्य और क्या होगा?

मरीजों की सेहत से जुड़े मसले पर संवेदनशीलता को ताक में तब ही रखा जा सकता है जब जिम्मेदारों के मुंह पर कमीशनखोरी का खून लग गया हो। अवधिपार व अमानक दवाइयों की आपूर्ति के आए दिन सामने आने वाले मामले भी ऐसी ही संवेदनहीनता से जुड़े हैं। अचरज इस बात का कि प्रदेश के चिकित्सा मंत्री गजेन्द्र सिंह खींवसर तक मॉनिटरों की खरीद में इस गड़बड़झाले को लेकर अंधेरे में ही है।

मंत्री जी इसे गंभीर मामला बताते हुए प्रकरण की जानकारी लेने की बात भले ही कहें लेकिन शिकायतें पहुंचने के बावजूद मॉनिटर आईसीयू में लग गए तो इसे मॉनिटरिंग की कमी ही कहा जाएगा। यह इसलिए भी कि न केवल जैसी जरूरत थी वैसे मॉनिटरों की खरीद हुई बल्कि बाजार भाव से भी अधिक में ये मॉनिटर खरीद लिए गए। भला इससे बड़ी अंधेरगर्दी और क्या होगी? जबकि उपकरण हो या दवा, खरीद का सामान्य सिद्धांत यह है कि पहले मार्केट का असेसमेंट किया जाए।

कहने को तो राजस्थान मेडिकल सर्विसेज कॉरपोरेशन (आरएमएससीएल) की ओर से की जाने वाली उपकरण खरीद में भी तकनीकी कमेटी बनती है। तकनीकी कमेटी के सदस्यों तक उपकरण व दवा आपूर्ति कंपनियों की पहुंच इतनी आसान होती है कि वे अपने अनुकूल शर्तें तय कराने में कामयाब हो जाती हैं। कई कंपनियां तो इन शर्तों की वजह से ही बाहर हो जाती है। एकाधिकार का खेल ऐसी ही शर्तों से शुरू होता है। तीन राज्यों में प्रतिबंधित होने वाली कंपनियां आखिर यहां क्यों कामयाब हो जाती है इस खेल को भी आसानी से समझा जा सकता है।

दवाइयों की खरीद में भी अव्वल तो मांग व खरीद के बीच इतना अंतर होता है कि जरूरत के वक्त ये अस्पतालों में पहुंच ही नहीं पाती। खरीद हो भी जाती है तो टैस्टिंग के नाम पर ‘क्वारंटाइन पीरियड’ रख लिया जाता है। और, इस अवधि में निश्चित प्रतिशत की खरीद स्थानीय स्तर पर करने की छूट का नया खेल चालू हो जाता है। रहा सवाल उपकरणों का, इनमें भी संबंधित उपकरणों के आकार-प्रकार व साइज की अनचाही शर्तें भी उन्हीं कंपनियों को आगे आने का मौका देती है जो कमीशनखोरी का जाल फैंकने में कामयाब हो जाती हैं।

ब्लैक लिस्टेट फर्म से उपकरण की आपूर्ति क्यों ली गई और मानकों के विपरीत होने पर भी मॉनिटर अस्पतालों की आईसीयू में कैसे पहुंच गए सिर्फ यह अचरज जताकर ही इस आपराधिक लापरवाही पर पर्दा नहीं डाला जा सकता। सरकारी खरीद जब लोगों की सेहत से जुड़ी हो तो पग-पग पर सावधानी बरतने की जरूरत है न कि इस कदर लापरवाही की। सवाल केवल इन मॉनिटरों की खरीद का नहीं। दवा हो या उपकरण, खरीद की प्रक्रिया पारदर्शी तो होनी ही चाहिए, यह भी सावचेती बरतनी होगी कि मरीजों के जीवन से खिलवाड़ करने वाली कोई प्रक्रिया सिस्टम से नहीं गुजर जाए।

क्योंकि चिकित्सा मंत्री खींवसर खुद विधानसभा के पिछले बजट सत्र में ही कह चुके हैं कि ‘स्वास्थ्य ही असली धन है। सोने और चांदी का मोल’ इसके आगे कुछ भी नहीं है। मंत्री जी! जो कमीशन को ही असली धन समझ रहे हों उनके मंसूबों को रोकने की जिम्मेदारी आपसे ही है क्योंकि महकमे में आपसे आगे कोई भी नहीं है।

Published on:
29 Jun 2026 04:03 pm