राजस्थान हाईकोर्ट ने साइबर अपराध के नाम पर निर्दोष लोगों के पूरे बैंक खाते फ्रीज करने पर सख्त रुख अपनाया है। कोर्ट ने कहा कि पुलिस बिना मजिस्ट्रेट आदेश के खाता फ्रीज नहीं कर सकती, केवल संदिग्ध राशि ही रोकी जा सकती है। कोर्ट ने डीजीपी को छह महीने में पुलिसकर्मियों को प्रशिक्षण देने और साइबर मामलों में नए दिशा-निर्देश लागू करने के आदेश दिए।
Rajasthan High Court: जयपुर: राजस्थान हाईकोर्ट ने साइबर अपराधों के नाम पर निर्दोष व्यक्तियों के बैंक खाते फ्रीज करने और जेल भेजने की प्रवृत्ति पर करारा प्रहार किया। कोर्ट ने स्पष्ट शब्दों में कहा कि पुलिस बिना मजिस्ट्रेट आदेश के किसी का पूरा बैंक खाता फ्रीज नहीं कर सकती।
कोर्ट ने कहा, केवल संदिग्ध राशि को ही रोकने का अधिकार है, अन्यथा संविधान के अनुच्छेद-21 का उल्लंघन है। हाईकोर्ट ने साइबर मामलों की जांच के लिए विस्तृत दिशा-निर्देश जारी करते हुए डीजीपी को निर्देश दिए कि छह महीने में सभी संबंधित पुलिसकर्मियों को ट्रेनिंग दी जाए।
न्यायाधीश अशोक कुमार जैन ने धर्मेंद्र चावड़ा, हरीश भाई और विक्रम सिंह की याचिकाओं पर यह आदेश दिया। कोर्ट ने साइबर मामलों में पुलिस की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल उठाते हुए कहा कि भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (बीएनएसएस) की धारा-106 में पुलिस को केवल जब्ती का सीमित अधिकार है।
धारा-107 के तहत खाता फ्रीज करने का अधिकार मजिस्ट्रेट को है। यदि किसी खाते में कुछ राशि संदिग्ध है, तो पूरे खाते को फ्रीज करना अनुचित है। केवल विवादित राशि को रोका जाना चाहिए, ताकि आरोपी की जीविका प्रभावित न हो और जांच भी निष्पक्ष बनी रहे। कोर्ट ने कहा कि उसकी गाइडलाइन म्यूल बैंक खातों पर लागू नहीं होगी।
कोर्ट के अनुसार, वर्ष 2025 में 100 से अधिक साइबर अपराध के मामले जमानत स्तर पर अदालत आए। इनमें से 80% मामलों में एफआईआर पुलिस ने स्वयं दर्ज की और लगभग 90% आरोपी पहली बार नामजद किए गए युवा थे, जिनकी उम्र 18 से 30 वर्ष के बीच थी। ज्यादातर मामले डीग, अलवर, भरतपुर, सवाई माधोपुर और खैरथल-तिजारा जिलों से हैं।
अधिकांश आरोपी बेरोजगार या अल्प-आय वर्ग से आते हैं और उनके खिलाफ कोई आपराधिक इतिहास नहीं पाया गया। कोर्ट ने इसे खतरनाक प्रवृत्ति बताते हुए कहा कि साइबर अपराध के मामले में कार्रवाई के नाम पर निर्दोष युवाओं को प्रताड़ित होने से बचाने के लिए संबंधित पुलिस कर्मियों को प्रशिक्षण आवश्यक है।
-साइबर अपराध की सूचना मिलते ही जांच कम से कम सहायक उपनिरीक्षक या उपनिरीक्षक को दी जाए।
-डीजीपी छह महीने में संबंधित पुलिसकर्मियों को प्रशिक्षण दिलाएं, जिससे निर्दोंषों को संरक्षण मिल सके।
-एफआईआर दर्ज होते ही एसपी को सूचित कर बैंक या अन्य वित्तीय भुगतान संबंधी एजेंसी से सूचना मांगने की अनुमति ली जाए। इसकी सूचना केस डायरी में दर्ज की जाए।
-बैंक या यूपीआई, वॉलेट सहित डिजिटल माध्यम से संदिग्ध लेन-देन की सूचना मिलते ही शिकायत-एफआईआर के साथ संबंधित बैंक या पेमेंट सर्विस सिस्टम को सूचना दी जाए, ताकि कार्रवाई हो सके।
-केवल पुलिस के आग्रह पर बैंक किसी का खाता ब्लॉक न करें और यह सीबीआई, ईडी या आर्थिक अपराध के मामलों में लागू नहीं हो।
-हर बैंक एक नोडल अधिकारी नियुक्त करे, जो ऐसे मामले में पुलिस के संपर्क में रहे। यह अधिकारी चौबीसों घंटे उपलब्ध रहे। इसके लिए ग्राहक सेवा केंद्र का भी उपयोग हो सकता है।
-यदि बैंक ने पुलिस के आग्रह पर खाते से लेन-देन रोका तो आर्थिक नुकसान के मामले में सिविल या आपराधिक कार्रवाई के लिए वह स्वयं जिम्मेदार होगी।
-संदिग्ध लेन-देन के बारे में पुलिस तत्काल एसपी या भुगतान सिस्टम संचालक (पीएसओ) को सूचना दे, सीधे भुगतान रोकने का आदेश नहीं दे।
-बचत खाते से संदिग्ध भुगतान होने पर पुलिस बैंक को सूचना दे।
-क्रेडिट कार्ड या डेबिट कार्ड से ऑनलाइन खरीददारी के लिए लेन-देन होने का मामला बैंक और ग्राहक के बीच का मामला है।
-खाता ब्लॉक करने या भुगतान रोकने का आग्रह मिलते ही 24 घंटे के भीतर संबंधित मजिस्ट्रेट को सूचित किया जाए। ऐसा नहीं किए जाने पर कार्रवाई की जाए।
-पालना की जिम्मेदारी डीजीपी, केंद्रीय गृह मंत्रालय के साइबर क्राइम कॉर्डिनेशन सेंटर, केंद्रीय वित्तीय सेवा विभाग, भारतीय राष्ट्रीय भुगतान निगम (एनपीसीआई) को सौंपी गई।