
जयपुर. राजस्थान की सरकारी चिकित्सा व्यवस्था में इन दिनों एक विरोधाभासी तस्वीर सामने आ रही है। एक ओर सरकारी सेवा में नियुक्त करीब 700 डॉक्टरों के ड्यूटी से गैरहाजिर होने की बात सामने आ रही है, वहीं दूसरी ओर मेडिकल ऑफिसर बनने के लिए हजारों अभ्यर्थी कतार में हैं। राज्य सरकार की ओर से निकाली गई मेडिकल ऑफिसर भर्ती में 600 पदों के मुकाबले करीब 30 हजार आवेदन प्राप्त हुए हैं। इस हिसाब से प्रत्येक पद के लिए औसतन 50 अभ्यर्थियों के बीच मुकाबला होगा। खास बात यह है कि इस भर्ती में केवल एमबीबीएस डिग्रीधारी ही नहीं, बल्कि पोस्ट ग्रेजुएशन (पीजी) और सुपरस्पेशलिटी की डिग्री हासिल कर चुके अभ्यर्थियों ने भी आवेदन किया है।
यह स्थिति प्रदेश की सरकारी स्वास्थ्य सेवाओं में डॉक्टरों की उपलब्धता और रोजगार के अवसरों के बीच बड़े अंतर को उजागर करती है। एक तरफ कई सरकारी अस्पतालों और स्वास्थ्य केंद्रों में चिकित्सकों की कमी मरीजों के उपचार को प्रभावित कर सकती है, तो दूसरी तरफ सरकारी मेडिकल ऑफिसर की नौकरी पाने के लिए बड़ी संख्या में योग्य उम्मीदवार प्रयास कर रहे हैं। सरकारी सेवा से डॉक्टरों की गैरमौजूदगी और सीमित पदों के मुकाबले आवेदनों की भारी संख्या ने चिकित्सा विभाग में मानव संसाधन के प्रबंधन पर सवाल खड़े किए हैं।
सरकारी सेवा में डॉक्टरों की गैरमौजूदगी और भर्ती में अभ्यर्थियों की भीड़ ने प्रदेश की चिकित्सा व्यवस्था में मानव संसाधन के कुप्रबंधन को चर्चा में ला दिया है। वहीं, मेडिकल ऑफिसर पद के लिए न्यूनतम योग्यता एमबीबीएस है, लेकिन आवेदन करने वालों में उच्च चिकित्सा शिक्षा प्राप्त अभ्यर्थियों का शामिल होना विशेषज्ञ डॉक्टरों के रोजगार विकल्पों पर भी सवाल उठाता है।
राजस्थान में करीब 700 डॉक्टरों के सरकारी सेवा से गायब होने का आंकड़ा इसलिए भी महत्वपूर्ण है, क्योंकि सरकारी अस्पतालों में चिकित्सकों की उपलब्धता सीधे मरीजों के इलाज से जुड़ी है। डॉक्टरों की गैरमौजूदगी का असर खास तौर पर उन अस्पतालों और स्वास्थ्य केंद्रों पर पड़ता है, जहां पहले से चिकित्सकीय संसाधनों की कमी है।
नई भर्ती में आवेदकों में कड़ा मुकाबला रहने की संभावना है। पिछली परीक्षा में कटऑफ 100 में औसतन 60 अंक थी। ऐसा पहली बार है कि जब एक सरकारी मेडिकल ऑफिसर पद के लिए 50 अभ्यर्थी दावेदारी कर रहे हैं।
- डॉ. वीरेन्द्र सिंह, पूर्व अधीक्षक, सवाईमानसिंह अस्पताल