सवाईमाधोपुर जिले में कड़े काटने की सिलसिलेवार घटनाओं के बाद अब कोटा और झुंझुनूं सहित अन्य जिलों के ग्रामीण इलाकों में भी सन्नाटा पसरने लगा है।
जयपुर। सोने-चांदी की आसमान छूती कीमतों और प्रदेश में बढ़ती लूट की वारदातों ने महिलाओं की नींद उड़ा दी है। सवाईमाधोपुर जिले में कड़े काटने की सिलसिलेवार घटनाओं के बाद अब कोटा और झुंझुनूं सहित अन्य जिलों के ग्रामीण इलाकों में भी सन्नाटा पसरने लगा है। सुरक्षा के अभाव में महिलाएं अब अकेले खेत पर जाने से कतरा रही हैं।
लुटेरों के खौफ से जूझती महिलाएं अब शादियों और त्योहारों में असली सोने-चांदी के बजाय आर्टिफिशियल ज्वैलरी का सहारा ले रही हैं, ताकि उनकी जान और माल दोनों सुरक्षित रह सकें। पुरुषों ने भी जेवर पहनना कम कर दिया है और सामूहिक रूप से खेतों में जाना शुरू किया है। राज्य में में मीणा, बैरवा, प्रजापति एवं गुर्जर समाज की महिलाएं परंपरागत पैरों में चांदी के मोटे कड़े पहनती हैं।
कोटा जिले की सांगोद निवासी महिला संतोष सुमन का कहना है कि एक-डेढ़ तोला सोने के आभूषण पहनकर शादी-ब्याह में जाने से भी डर लगने लगा है। ऐसे में सोने-चांदी के आभूषण घर पर रखकर आर्टिफिशल ज्वैलरी पहननी पड़ रही है। बुजुर्ग महिला ग्यारसी बाई ने बताया कि वो गले एवं पैरों में करीब एक किलाे वजनी आभूषण पहनती हैं। आभूषण पुश्तैनी हैं, लेकिन बीते एक माह से घरवालों ने पहनना बंद करवा दिए। गाडि़या लुहार पार्वती बाई ने बताया कि सोने-चांदी के आभूषण घरों में या रिश्तेदारों के यहां संदूक एवं तिजोरियों में छुपाना पड़ रहा है।
झुंझुनूं जिले के पचलंगी की केला देवी बंजारा व संजना बंजारा ने बताया कि बंजारा समाज में महिलाओं के साथ पुरुष भी गहने पहनते हैं। सोना, चांदी में आए उछाल व बढ़ी कीमतों के बाद आए दिन हो रहे हादसों के बाद इन गहनों का परित्याग करने को मजबूर हो गए हैं। क्योंकि गांव-गांव जाकर व्यापार करते हैं। इससे हर समय खतरा बना रहता है।
आबूरोड चांदी के आसमान छूते भावों को देखते हुए टीएसपी आबूरोड ब्लॉक में गरासिया समाज विवाह समेत अन्य सामाजिक कार्यक्रमों में युवतियों-महिलाओं की ओर से चांदी के आभूषण पहने की परंपरा को जीवंत रखते हुए सुरक्षा के लिहाज अलर्ट किया गया है। सिरोही गरासिया समाज विकास सेवा समिति ने शीघ्र गांवों में बैठकें आयोजित कर महिलाओं को सोन-चांदी के आभूषण पहने के दौरान बरती जाने वाली सावधानियों और अपनी सुरक्षा को लेकर जागरूक करने का निर्णय किया है।
हमारे समाज में कड़े पहनना पहचान और परंपरा है, लेकिन अब इन्हीं कड़ों की वजह से डर लगने लगा है। अकेले खेत या बाहर निकलने से घबराहट होती है।
जगनी देवी मीणा, बामनवास
पहले कभी ऐसा डर नहीं था, लेकिन अब परिवार वाले भी कड़े पहनकर अकेले जाने से मना करने लगे हैं। सुरक्षा के लिए परंपरा छोड़ने की मजबूरी बन रही है। गांवों में अब महिलाएं कड़े कम पहनने या बाहर जाते समय उतारने पर विचार कर रही हैं।
राजन्ती देवी प्रजापत, भीटोली