
जयपुर। कभी पत्थर से आग जलाने का हुनर बड़ी तकनीक थी, तो कभी पहिए का आविष्कार इंसानी सभ्यता की सबसे बड़ी छलांग। हर युग ने अपनी नई भाषा गढ़ी, नया साधन दिया। जिसने भी वक्त के साथ इस बदलते हुए हुनर को सीख लिया, वह आगे बढ़ता गया और जो पीछे छूट गया, वह समय की रेत में कहीं खो गया। आज डिजिटल और आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस के दौर में भी कमोवेश ऐसा ही है। कई सीनियर सिटीजंस ने बदलाव की नई रोशनी के साथ कदम मिला लिए, तो डिजिटल भाषा से अनजान कई बुजुर्गों को लगता है कि वे कहीं पीछे छूट गए हैं।
ऐसे ही जागरूक नागरिक हैं, निवारू रोड निवासी रेलवे से सेवानिवृत्त 71 वर्षीय आरके मित्तल। उन्होंने बताया कि जब सुपर मार्केट या ऑनलाइन का जमाना नहीं था, तब किराना, साबुन-सर्फ व स्टेशनरी सहित अन्य सामान खरीदने के लिए अलग-अलग बाजारों में जाना होता था। वहां भीड़ अधिक होने के कारण इंतजार भी करना होता था। इस कारण राशन या जरूरी सामान सप्ताह में छुट्टी के दिन लाते थे।
एक बार बच्चों को मोबाइल फोन से ऑनलाइन सामान मंगाते देखा तो अगले ही दिन फोन में ऑनलाइन ग्रॉसरी ऐप डाउनलोड कर लिया। वे बताते हैं कि अब जो चीज खाने की इच्छा करती है, वो उसे तुरंत ऑर्डर कर देते हैं।
जयपुर में की गई तकनीक से दोस्ती मुंबई में बेहद काम आई। हाल ही 15-20 दिन मुंबई में रहकर आए मित्तल ने बताया कि वे वहां अपने फेवरेट फूड को बहुत मिस कर रहे थे। घर के आसपास भी कोई ऐसी शॉप नहीं थी। इस कारण अपने मोबाइल फोन में ऑनलाइन ऐप से दाल-चावल की सामग्री मंगाई और घर पर बनवाकर पूरे परिवार के साथ बैठकर खाई।
आधुनिकता की भीड़ से निकलकर अपनी शांत, सुकून भरी दुनिया में लौट जाता हूं और मन को सुकून देने वाला काम करता हूं। पुराने दौर का वह क्लासिक संगीत सुनना मेरा पसंदीदा शगल है। सिंगिंग के साथ ही फिर से पचास साल पुराने दौर को जीता हूं।
88% संवाद सामने बैठकर होता है। डिजिटल माध्यमों का उपयोग लगातार बढ़ रहा है। जिन बुजुर्गों के बच्चे बाहर रहते हैं, डिजिटल तकनीक से उनसे दिन में दो बार मुलाकात जरूर होती है।
साइकोलॉजिस्ट मीनू शर्मा ने बताया कि साइबर ठग अब भरोसे-भावनाओं का इस्तेमाल कर रहे हैं। परिवार से दूर, अकेले रहने वाले बुजुर्गों के साथ ऐसी घटनाएं ज्यादा होती हैं। ठग अपनाकर दिखाकर उनका भरोसा जीत लेते हैं और लुभावनी बातों के जाल में फंसा लेते हैं। अजनबी फोन कॉल्स से ज्यादा देर बात न करें। अनजान व्यक्ति अगर पैसों के लेन-देन का जिक्र करे तो तुरंत कॉल काट दें, परिजन से इसे तुरंत साझा करें।
रिपोर्ट में सुझाव दिया गया कि युवाओं को आगे आकर बुजुर्गों को डिजिटल रूप से साक्षर बनाने में मदद करनी चाहिए, ताकि वे खुद को अकेला या कटा हुआ महसूस न करें। बुजुर्गों को डिजिटल तकनीक का प्रशिक्षण मिलने पर वे अधिक आत्मनिर्भर बनने के साथ ही परिवार व समाज से बेहतर तरीके से जुड़े रह सकते हैं।
सोर्स:हेल्पएज इंडिया का 2025 में कराया इंडिया इंटरजनरेशनल बॉन्ड्स (आईबीओ): अंडरस्टैंडिंग इंटरजनरेशनल डायनामिक्स एंड पर्सेप्शंस ऑन एजिंग' नामक सर्वे