जयपुर

संपादकीय: ‘टाइगर स्टेट’ में शावकों की भूख से मौत चिंताजनक

यह स्पष्ट रूप से प्रशासनिक अक्षमता और निगरानी तंत्र की विफलता है। सूरज की तपिश के साथ जंगलों के प्राकृतिक जल स्रोत सूख चुके हैं।
2 min read
Apr 28, 2026
Feature image

दुनिया के सबसे शक्तिशाली शिकारियों में शुमार बाघ के शावकों का 'टाइगर स्टेट' के आंगन में भूख से दम तोड़ देना, वन्यजीव संरक्षण के दावों पर ऐसा बदनुमा दाग है, जिसे धोना आसान नहीं होगा। कान्हा टाइगर रिजर्व में बाघिन टी-141 के तीन शावकों की मौत महज एक प्राकृतिक घटना नहीं, बल्कि वन प्रबंधन के खोखलेपन की विस्तृत पोस्टमार्टम रिपोर्ट है। आंकड़े गवाह हैं कि जनवरी से अप्रेल 2026 के भीतर अकेले मध्य प्रदेश में ही 23 बाघों की मौत हो चुकी है। इसके बावजूद वन अधिकारियों के चेहरे पर कोई शिकन नहीं है।

वन अमला रेडियो कॉलर और हाइ-टेक मॉनिटरिंग के नाम पर करोड़ों का बजट खर्च करता है, लेकिन उसे यह भनक तक नहीं लगती कि एक बाघिन शारीरिक रूप से इतनी लाचार हो चुकी है कि वह अपने शावकों का पेट तक नहीं भर पा रही। रेडियो कॉलर केवल सिग्नल देने के लिए नहीं, बल्कि संकट के समय रेस्क्यू के लिए होते हैं। यदि बाघिन कई दिनों से शिकार करने में अक्षम थी, तो ट्रैकिंग टीम क्या केवल दफ्तरों में बैठकर फाइलों पर बाघों की संख्या गिन रही थी? भूख से हुई मौत कभी प्राकृतिक नहीं हो सकती। यह स्पष्ट रूप से प्रशासनिक अक्षमता और निगरानी तंत्र की विफलता है। सूरज की तपिश के साथ जंगलों के प्राकृतिक जल स्रोत सूख चुके हैं। जब रेड डाटा की लुप्तप्राय: श्रेणी में शामिल बाघों की यह दुर्गति है, तो अन्य वन्यजीवों की प्यास और भूख का मंजर क्या होगा, इसका अंदाजा लगाना कठिन नहीं है। कृत्रिम जलाशयों को भरने में बरती गई सुस्ती ने जंगलों को डेथ ट्रैप में बदल दिया है। यहां सवाल केवल संसाधनों के अभाव का नहीं, बल्कि इच्छाशक्ति के अकाल का भी है।

अंतरराष्ट्रीय स्तर पर वन्यजीव संरक्षण के कड़े मानक हैं। अफ्रीकी सवाना मॉडल में सूखे के दौरान सोलर पंपों से भूजल निकालकर वन्यजीवों के लिए जीवन सुनिश्चित किया जाता है। रूस में अमूर टाइगर्स के संरक्षण के लिए शिकार की कमी होने पर सप्लीमेंट्री फीडिंग यानी पूरक आहार का प्रावधान है। भारत ग्लोबल टाइगर फोरम का अग्रणी सदस्य है। ऐसे में, शावकों की भूख से मौतें अंतरराष्ट्रीय मंचों पर भारत की वन्यजीव संरक्षण छवि को धूमिल करती हैं। अंतरराष्ट्रीय कानून वन्यजीवों के केवल व्यापार रोकने के लिए नहीं, बल्कि प्रजातियों के सम्मानजनक अस्तित्व के अधिकार की भी वकालत करते हैं, जिसका उल्लंघन कान्हा टाइगर रिजर्व में हुआ है। वन प्रबंधन को यह समझना होगा कि बाघ केवल पर्यटन का टूल या सरकारी आंकड़ों का हिस्सा नहीं हैं। वे हमारे पारिस्थितिकी तंत्र की रीढ़ हैं। जवाबदेही उन अधिकारियों की तय होनी चाहिए जिनकी आंखों के सामने एक कुनबा खत्म हो गया। यदि टाइगर स्टेट के जंगलों में शावक भूख से मरेंगे, तो वह दिन दूर नहीं जब यह गौरवशाली तमगा केवल इतिहास की किताबों और सरकारी विज्ञापनों तक ही सीमित रह जाएगा।

Updated on:
28 Apr 2026 03:21 pm
Published on:
28 Apr 2026 03:21 pm