पचपदरा (बाड़मेर) तेल रिफाइनरी में विस्फोट जैसी घटना ने औद्योगिक सुरक्षा पर गंभीर प्रश्न खड़े कर दिए हैं।
डॉ. रिपुन्जय सिंह, लेखक आपदा प्रबंधन के प्रभारी अधिकारी रहे हैं - आज जब भारत तीव्र औद्योगिक विकास के दौर से गुजर रहा है, तब यह प्रश्न और भी महत्वपूर्ण हो जाता है कि क्या यह विकास सुरक्षित, टिकाऊ और मानवीय है? विकास केवल तेज नहीं होना चाहिए, बल्कि जिम्मेदार भी होना चाहिए, ताकि वह लंबे समय तक टिके, समाज को सशक्त बनाए व आने वाली पीढिय़ों के लिए सुरक्षित विरासत छोड़े। रासायनिक और औद्योगिक आपदाएं इस संतुलन की विफलता का सबसे स्पष्ट उदाहरण हैं। औद्योगिकीकरण ने रोजगार, उत्पादन और आर्थिक प्रगति को बढ़ावा दिया है, लेकिन इसके साथ जोखिम भी तेजी से बढ़े हैं। रासायनिक संयंत्र, थर्मल पावर स्टेशन, तेल रिफाइनरी और गैस इकाइयां, ये सभी अत्यधिक संवेदनशील क्षेत्र हैं जहां एक छोटी-सी चूक भी बड़े विनाश का कारण बन सकती है। पचपदरा (बाड़मेर) तेल रिफाइनरी में विस्फोट जैसी घटना ने औद्योगिक सुरक्षा पर गंभीर प्रश्न खड़े कर दिए हैं। यह घटना स्पष्ट करती है कि औद्योगिक इकाइयों में तकनीकी खामियां और रिसाव बड़े हादसों का कारण बन सकते हैं, आपातकालीन प्रतिक्रिया प्रणाली का मजबूत होना जरूरी है। यह घटना एक चेतावनी है कि औद्योगिक विकास के साथ-साथ सुरक्षा और जोखिम प्रबंधन को सर्वोच्च प्राथमिकता दी जानी चाहिए। इतिहास हमें चेतावनी देता है। 1984 की भोपाल गैस त्रासदी, 2020 की विशाखापट्टनम गैस लीक और हाल में पचपदरा की ये घटनाएं केवल दुर्घटनाएं नहीं थीं, बल्कि लापरवाही, कमजोर निगरानी और असंतुलित विकास के परिणाम थीं। औद्योगिक दुर्घटनाएं अक्सर अचानक नहीं होतीं, बल्कि समय के साथ पनपते जोखिमों का परिणाम होती हैं।
विशेष रूप से यह देखा गया है कि वे ओवरप्रेशर, स्केलिंग, पानी के स्तर का गलत प्रबंधन और थर्मल असंतुलन के कारण होती हैं। पचपदरा (बाड़मेर), सक्ति (छत्तीसगढ़), ओएनजीसी जयपुर में हुआ विस्फोट, नेवेली (2020) में प्लांट रीस्टार्ट के दौरान विस्फोट और विशाखापट्टनम गैस लीक आदि भी इसी प्रकार की तकनीकी और प्रबंधन संबंधी विफलताओं का परिणाम हैं। इसी तरह, सुरक्षा प्रणाली की विफलता यह दर्शाती है कि अस्थिर संचालन के दौरान जोखिम अधिक होता है। दुर्भाग्यवश हमारे नियामक ढांचे में इन महत्वपूर्ण चरणों पर अतिरिक्त निगरानी का अभाव है। सरकार की ओर से 'ईज ऑफ डूइंग बिजनेस' को बढ़ावा देने के प्रयासों के तहत स्व-प्रमाणीकरण और निर्धारित तृतीय-पक्ष ऑडिट को प्राथमिकता दी गई है। हालांकि, इससे आश्चर्यजनक निरीक्षण की संख्या में कमी आई है, जो कि सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए अत्यंत आवश्यक हैं। 2025 में 'अधिसूचित बॉयलर दुर्घटना जांच नियम' एक सकारात्मक कदम हैं, लेकिन यह देखना अभी बाकी है कि क्या वे इन संरचनात्मक खामियों को दूर कर पाएंगे। औद्योगिक आपदाओं में सबसे अधिक प्रभावित श्रमिक होते हैं। औद्योगिक क्षेत्रों में हुए हादसों की जांच में पाया गया कि कई श्रमिकों को उनके कार्यस्थल पर उपयोग किए जाने वाले रसायनों के नाम और गुणों की जानकारी तक नहीं थी। सुरक्षा संकेत और मैनुअल भी अक्सर उनकी भाषा में उपलब्ध नहीं होते। 'व्यावसायिक सुरक्षा, स्वास्थ्य एवं कार्यस्थल स्थितियां संहिता, 2020' में भी मुख्य नियोक्ता की जिम्मेदारी को स्पष्ट रूप से परिभाषित नहीं किया गया है, जिससे जवाबदेही का संकट उत्पन्न होता है। अनुकूलन क्षमता, केवल आपदा के बाद पुनर्निर्माण नहीं है, बल्कि उससे पहले की तैयारी, जागरूकता और क्षमता निर्माण का समग्र दृष्टिकोण है। यह जरूरी है कि हम जोखिम को भय के रूप में नहीं, बल्कि स्पष्टता, तैयारी और उद्देश्य के साथ देखें। इसके लिए नियमित प्रशिक्षण, मॉक ड्रिल, और तकनीकी उन्नयन जरूरी हैं। आज यह आवश्यक है कि हम समुदाय-नेतृत्व वाले अनुकूलन, आजीविका विविधीकरण और आपसी सहयोग को बड़े पैमाने पर लागू करें। हर आपदा हमें एक सबक देती है, लेकिन दुर्भाग्य से हम अक्सर उसे भूल जाते हैं। हर घटना का गंभीर विश्लेषण करें और उसे नीति और व्यवहार में शामिल करें।
प्रणालीगत दृष्टिकोण, एक समग्र सोच की मांग करता है, जिसमें उद्योग, सरकार, समाज और वैज्ञानिक संस्थान सभी मिलकर कार्य करें। केवल तकनीकी सुधार पर्याप्त नहीं हैं। श्रमिक प्रशिक्षण, नीति सुधार, निगरानी प्रणाली व जागरूकता भी आवश्यक हैं। समय की मांग है कि हम एक ऐसी विकास नीति अपनाएं, जो न केवल आर्थिक प्रगति को बढ़ावा दे, बल्कि मानव जीवन, पर्यावरण और सामाजिक संरचना की भी रक्षा करे। विकास की सच्ची पहचान उसकी गति में नहीं, उसकी स्थिरता और जिम्मेदारी में होती है।