
जयपुर
राजस्थान प्रदेश में एक ऐसी जगह भी है जहां पर भामाशाहों ने अपनी 150 बीघा जमीन चींटियों के लिए दान कर दी। यह जगह जालौर के भीनमाल से 13 किमी दूर निम्बावास गांव में हैं। जहां पर डेढ़ सौ बीघा जमीन में कीड़ीनगरा बसा हैं। यहां पर चींटियों की एक अलग ही दुनियां बसी हैं। जालौर में स्थित प्रदेश के एकमात्र इस कीड़ीनगरा में करोड़ों की संख्या में चींटियां हैं। 150 बीघा में बसे इस कीड़ीनगरा में सिर्फ चींटियां ही चींटियां दिखाई देते हैं। चींटियों के लिए बने इस नगरा की एक अलग से मान्यता भी है। जहां पर राजस्थान भर से लोग इन चींटियों को दाना ड़ाल कर पुण्य कमाने के लिए यहां पर आते हैं। इस स्थल की विशेषता यह है कि इतनी बड़ी जगह में होने के बाद भी इसे तारबंदी कर सुरक्षित रखा गया हैं। यहां लोग चींटियों को भोजन ड़ाल पुण्य तो कमाते ही है और मान्यता है कि यहां चींटियों को दाना खिलाने से सभी दुख दर्द,बीमारियों से मुक्ति मिलती हैं और यहां जो दाना ड़ालता है उसके सुख-समृद्धि में वृद्धि होती हैं।
यह है खास बात
इस जगह की खात बात यह है कि यहां पर जो चींटियां है वह अन्य चींटियों के मुकाबले थोड़ी बड़ी होती हैं। यहां पर अमावस्या और पूर्णिमा के दिन हजारों की संख्या में श्रद्धालु पहुंचते हैं। जो सुबह से लेकर शाम तक यहां पर चींटियों को अपने हाथों से दाना ड़ालते हैं। हालांकि चींटियां ज्यादा सुबह और शाम को ही दिखाई देती हैं। दिन में धुप में यह ज्यादा जमीन के अंदर ही रहती हैं। इसलिए दिन में आने वाली महिलाएं या श्रद्धालु यहां पर पहुंचने के बाद भगवान के भजन कीर्तन करती है और देर तक रुकते हैं। यहीं नहीं कीड़ीनगरा के मुख्य द्वार पर ही स्टोर रुम भी बना रखा हैं। जहां पर श्रद्धालु चीटियों को दान करने के लिए चींटियों के भोजन को कट्टों में भरकर यहां लेकर आते है। कई तो ऐसे है जो हर पन्द्रह दिन में यहां पर चींटियों के लिए भोजन के कट्टे भिजवाते हैं। यहां आने वाले लोग तो चींटियों को भोजन ड़ालते ही है साथ ही स्टोर से रोजना चार क्विंटल दाना चींटियों को खाने के लिए दिया जाता हैं।
चींटियों को यह खिलाते है लोग
यहां आने वाले लोग चींटियों को को खिलाने के लिए अनाज, चूरमा, शक्कर, दलिया, बिस्किट,नारियल चुरा,आटा, बाजरी आदि लेकर आते हैं। लोग जो इन्हें अपने हाथ से ड़ालते है वह ड़ालते है बाकी स्टोर में जमा करवा देते हैं। इससे यहां पर चींटियों के लिए हमेशा पर्याप्त भोजन की व्यवस्था रहती हैं। गांव के ही लोगों ने रोज चींटियों को भोजन देने की व्यवस्था को संभाल हुआ हैं। लेकिन अमावस्या और पूर्णिमा को यहां पर लोगों की सबसे ज्यादा आवक रहती हैं।