इस बजट में प्रकृति, पर्यावरण एवं स्वास्थ्य की दृष्टि से महत्वपूर्ण कचरा प्रबंधन को नई दिशा अपेक्षित थी, किंतु कार्बन के प्रमुख स्रोत खाद्य बर्बादी, खुले में कचरा जलाने, केंद्रीकृत प्रसंस्करण को लगाम लगाने के बारे में किसी प्रकार का उल्लेख नहीं किया गया।
केंद्रीय बजट में स्टील, ऊर्जा, सीमेंट जैसे भारी उद्योगों से कार्बन इकट्ठा करने, उपयोग और भंडारण के लिए बीस हजार करोड़ रुपए का कोष स्थापित कर स्वच्छ उत्पादन को दिशा देने का प्रयास किया गया है। वहीं, नाभिकीय ऊर्जा को बढ़ावा देने के लिए भी बीस हजार करोड़ रुपए का बजटीय प्रावधान है।युवा शक्ति को समर्पित बजट में संसाधनों के समान रूप से सभी वर्गों तक बंटवारे को कर्तव्य बोध के साथ संकल्पित करते हुए हरित मिशन के मद में भी दोगुने से अधिक राशि की वृद्धि की गई है। वायु प्रदूषण को लेकर प्रकट की जा रही गंभीर चिंताओं को दरकिनार कर प्रस्तुत केंद्रीय बजट में प्रदूषण नियंत्रण प्रावधानों में गत वर्ष की अपेक्षा 16 प्रतिशत की कमी करते हुए मात्र 1091 करोड़ रुपए का आवंटन किया गया है। हालांकि संबंधित वन, पर्यावरण एवं जलवायु परिवर्तन मंत्रालय के लिए गत वर्ष की अपेक्षा आठ प्रतिशत अधिक बजट रखा गया है। अब भी विडंबना यह है कि पर्यावरण के मूलभूत उद्देश्य बेहतर जीवन को इन सीमित पहल के जरिए हासिल किया जाना कठिन प्रतीत होता है।
स्थापित कोष की अवधि पांच वर्ष होना उसके प्रभावी क्रियान्वयन पर प्रश्न खड़े करता है।स्वास्थ्य समस्याओं के क्षेत्र में हुए परिवर्तन के चलते गैर संक्रामक रोग शीर्ष पर आ गए हैं, जिनके अहम कारक में से एक तेजी से फैलता प्रदूषण है। हृदय एवं फेफड़ों की बीमारियों में निरंतर विस्तार हो रहा है। बेहतर वायु कायम कर इन बीमारियों पर बहुत हद तक नियंत्रण किया जा सकता है। बढ़ते गैर संक्रामक रोगों के निदान के दौरान प्लास्टिक एवं कपड़े की भूमिका को लेकर भी गहरी चिंता प्रकट की जाती रही है। हालांकि बजट प्लास्टिक नियंत्रण पर विशेष रूप से कोई उल्लेख नहीं करता किंतु कपड़े से हो रही बीमारियों को प्राकृतिक, सस्टेनेबल, हथकरघा वस्त्रों के विस्तार एवं उन्नयन के लिए वस्त्र संबंधी एकीकृत कार्यक्रम के प्रभावी क्रियान्वयन के जरिए बहुत हद तक कम कर सकता है। आश्चर्यजनक रूप से इंदौर में हाल में हुई त्रासदी के बावजूद स्वच्छ पेयजल के लिए कोई ठोस घोषणा नहीं की गई।
इस बजट में प्रकृति, पर्यावरण एवं स्वास्थ्य की दृष्टि से महत्वपूर्ण कचरा प्रबंधन को नई दिशा अपेक्षित थी, किंतु कार्बन के प्रमुख स्रोत खाद्य बर्बादी, खुले में कचरा जलाने, केंद्रीकृत प्रसंस्करण को लगाम लगाने के बारे में किसी प्रकार का उल्लेख नहीं किया गया। इस संदर्भ में एक सराहनीय कदम स्वच्छ ऊर्जा की श्रेणी में मानी जाने वाली सीएनजी गैस में बायोगैस अवयव को पूर्णतया केंद्रीय एक्साइज ड्यूटी से मुक्त करने का रहा है। पिछले कुछ वर्षों में कचरा प्रबंधन में कचरे से खाद को विपणन अवरोधों के चलते अपेक्षित सफलता न मिलने एवं ऊर्जा निर्माण की अपनी सीमाओं के फलस्वरूप सीएनजी निर्माण एक कारगर कदम के रूप में उभरकर आया है। यहां तक की छोटी मात्रा में भी कचरे का प्रसंस्करण करने में यह कारगर विधि साबित हुई है। यह रियायत प्रभावी कचरा प्रबंधन के लिए दूरगामी कदम साबित होगी।
इस बार के बजट में स्वास्थ्य की मद में लगभग 10 प्रतिशत की बढ़ोतरी कर 1.06 लाख करोड़ रुपए का प्रावधान है और प्राथमिक स्वास्थ्य की देखभाल करने वाले राष्ट्रीय स्वास्थ्य मिशन के बजट में भी गत वर्ष के संशोधित अनुमान की तुलना में 6 प्रतिशत की बढ़ोतरी कर लगभग 39 हजार करोड़ का प्रावधान किया है। स्वास्थ्य के मद में बढ़ोतरी की गई है किंतु अब भी यह राष्ट्रीय स्वास्थ्य नीति के तहत सकल घरेलू उत्पाद के एक प्रतिशत प्रावधान के लक्ष्य से आधी भी नहीं है। इतने प्रावधानों के बावजूद बजट बीमारी रोकने की जगह इलाज को बढ़ावा देने पर ही केंद्रित है। स्वास्थ्य का मुद्दा ऐसा है, जिससे प्रत्यक्ष एवं अप्रत्यक्ष रूप से सम्पूर्ण अर्थव्यवस्था प्रभावित होती है।बजट जहां विभिन्न चिकित्सा पद्धतियों के प्रोत्साहन का जिक्र करता है, वहीं शहरी पर्यावरणीय स्वास्थ्य इसका मुद्दा नहीं बन पा रहा है। उचित होता कि यह बजट संस्थानिक विकास के साथ बचाव के कदमों पर अधिक ध्यान दे पाता। लक्ष्य बेहतर चिकित्सा सुविधाओं के साथ प्रभावी प्रदूषण नियंत्रण होना चाहिए, ताकि स्वस्थ जीवन जिया जा सके।