जयपुर

आज भी दिल की राग छूता है रेडियो

World Radio Day 2020: आज रेडियो सुनने का जमाना बीते दौर की बात हो गई लेकिन राजधानी जयपुर में आज भी कुछ ऐसे शौकीन हैं जो न केवल रेडियो सुनते हैं बल्कि उनके पास विंटेज रेडियो के संग्रह का बेहतरीन खजाना भी है। इनमें से कई तो 70 साल से भी ज्यादा पुराने हैं। आज 13 फरवरी को विश्व रेडियो दिवस पर बताते हैं जयपुर के ऐसे ही दो रेडियो शौकीनों के बारे में जिन्होंने विरासत को संजो कर रखा है।  

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Feb 13, 2020
आज भी दिल की राग छूता है रेडियो

देवेन्द्र सिंह / जयपुर। आज रेडियो सुनने का जमाना बीते दौर की बात हो गई लेकिन राजधानी जयपुर में आज भी कुछ ऐसे शौकीन हैं जो न केवल रेडियो सुनते हैं बल्कि उनके पास विंटेज रेडियो के संग्रह का बेहतरीन खजाना भी है। इनमें से कई तो 70 साल से भी ज्यादा पुराने हैं। आज 13 फरवरी को विश्व रेडियो दिवस पर बताते हैं जयपुर के ऐसे ही दो रेडियो शौकीनों के बारे में जिन्होंने विरासत को संजो कर रखा है।


हम सब समय के साथ बदल गए हैं। नई तकनीक को ऐसा अपनाया कि पुरानी को भूल गए। लेकिन मैंने एेसा नहीं किया। पुरानी चीजों को सहेजना मुझे सुकून देता है। यह कहना है मानसरोवर निवासी निर्मल पारीक का। 2008 में भारतीय खाद्य निगम में क्वालिटी कंट्रोलर के पद से रिटायर्ड हुए पारीक बताते हैं कि रेडियो सहजने की शुरुआत 1970 में अपने घर में रखे पिताजी के रेडियो से की। पहले घर और बाद में रिश्तेदारों से रेडियो संग्रह करना शुरू किया। धीरे-धीरे शौक परवान चढऩे लगा। बाद में हटवाड़े व रेडियो ठीक करने वाले मिस्त्रियों से पुराने रेडियो खरीदना शुरू किया। वर्तमान में पारीक के घर में बने संग्राहलय में वर्ष 1950 से लेकर 1995 तक के 65 पुराने रेडियो और ट्रांजिस्टर का कलेक्शन सहेजे हुए हैं। पारीक अपने पूरे घर को ही संग्राहलय बना रखा है। रेडियो के अलावा पुरानी घडि़यों व टाइप राइटर का भी अच्छा संग्रह है। 72 साल की उम्र में भी उनका जुनून कम नहीं हुआ और वे अपना पूरा समय इन पुरानी वस्तुओं को सहजने में ही बिताते हैं।

फ्रांस, जर्मनी, जापान, इंग्लैंड, फिल्प्सि के रेडियो भी

पारीक के म्यूजियम में 20 से अधिक विंटेज रेडियो है। इनमें से अधिकांश चालू हालत में है। फ्रांस का पिजो, जर्मनी का टेलिफोन किन, जापान का एनईसी, इग्लैंड का बुश, मरफी, फिलिप्स प्रमुख है। इसके अलावा टू-इन-वन रेडियो भी है। पारीक का कहना है कि टेलिविजन के आने के बाद रेडियो की लोकप्रियता में कमी आई, लेकिन पीएम मोदी की मन की बात के बाद रेडियो ने फिर से नया मुकाम पाया है। रेडियो आज एफएम के रूप में मौजूद है।

पारीक बताते हैं कि चार दशक पहले तक रेडियो सुनने के लिए लाइसेंस लेना पड़ता था। इसके लिए भारतीय डाक-तार विभाग रेडियो का लाइसेंस जारी करता था। घरेलू श्रेणी के लिए 15 रुपए और कॉमर्शिल लाइसेंस के लिए 50 रुपए सालाना का शुल्क देना पड़ता था। लाइसेंस को हर साल रिन्यू करवाना होता था। अगर लाइसेंस धारक के पास एक से ज्यादा रेडियो सेट्स होते थे तो फीस में आधी छूट दी जाती थी।

इन्होंने तीन सौ रेडियो को बनाया अपना दोस्त

जमाना भले ही ऑनलाइन म्यूजिक के पीछे भाग रहा हो। लेकिन शहर में दीवाना ऐसा भी है, जो सालों पुराने रेडियो को संभाल रहा है। रेडियो के प्रति ऐसी दीवानगी कही नहीं देखी, एक, दो, नहीं बल्कि तीन सौ रेडियो को अपना दोस्त बना लिया। हम बात कर रहे हैं मालवीय नगर में रहने वाले विनय शर्मा की। पेशे से शर्मा भले ही चित्रकार हो, लेकिन उनका दिल तो अपने घर के तहखाने में बने रेडियो घर में बसता है। उनके संग्राहलय में तीन सौ पुराने रेडियो है। ये भी आधुनिक तकनीक वाले नहीं बल्कि वर्ष 1938 से लेकर 1975 तक के। एडवांस म्यूजिक सिस्टम और स्मार्ट फोन के जमाने में यह अनूठा रेडियो कलेक्शन लोगों के लिए म्यूजियम सा बन गया है।

विनय शर्मा बताते हैं कि पहली बार वर्ष 1991 मे अपने गांव लालसोट से पुराना रेडियो लेकर आया था। इसके बाद रेडियो संग्रह का ऐसा शौक लगा कि शहर में लगने वाले कबाड़ी बाजार, हटवाड़े में भी पुराने रेडियो खरीदने पहुंच जाता था। हर रेडियो मूर्ति शिल्प जैसा लगता है। यह किसी धरोहर से कम नहीं है। इतने पुराने होने के बावजूद कई रेडियो अभी भी चलते हैं। जब भी समय मिलता है म्यूजियम में बैठ कर रेडियो सुनते हैं।

Updated on:
13 Feb 2020 02:13 pm
Published on:
13 Feb 2020 01:49 pm
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