जैसलमेर

थार की गोद में पलते हिरण..विश्नोई समाज की महिलाओं ने दिया ममता का संरक्षण

इन गांवों में यदि किसी हिरणी की मौत हो जाए और उसका शावक अनाथ रह जाए तो महिलाएं उसे घर ले आती हैं। उसे गोद में सुलाया जाता है, गर्म कपड़ों में रखा जाता है और जरूरत पड़ने पर स्तनपान तक करवाया जाता है। मरुभूमि के बीच ऐसे दृश्य करुणा के साथ-साथ प्रकृति के साथ गहरे आत्मिक रिश्ते की मिसाल बन चुके हैं।

3 min read
May 26, 2026
जैसलमेर. सरहदी जिले के ग्रामीण क्षेत्रों में हिरणों के बच्चों की देखभाल करती महिलाएं।-

थार के रेगिस्तान में सूरज ढलते ही सरहदी जिले के खेतोलाई और धोलिया ग्रामीण क्षेत्रों में की ढाणियों एक अलग दृश्य जीवंत होने लगता है। कहीं आंगन में हिरण का शावक बच्चों संग खेलता दिखता है, तो कहीं कोई महिला उसे गोद में लेकर दूध पिला रही होती है। मरुभूमि की कठोर जमीन पर यह दृश्य केवल दया नहीं, बल्कि इंसान और प्रकृति के बीच सदियों पुराने आत्मिक रिश्ते की कहानी कहता है। विश्नोई समाज की बस्तियों में हिरण वन्यजीव नहीं, परिवार की सांसों जैसा हिस्सा माने जाते हैं। किसी शावक की मां मर जाए तो गांव की महिलाएं उसकी मां बन जाती हैं।

इन गांवों में यदि किसी हिरणी की मौत हो जाए और उसका शावक अनाथ रह जाए तो महिलाएं उसे घर ले आती हैं। उसे गोद में सुलाया जाता है, गर्म कपड़ों में रखा जाता है और जरूरत पड़ने पर स्तनपान तक करवाया जाता है। मरुभूमि के बीच ऐसे दृश्य करुणा के साथ-साथ प्रकृति के साथ गहरे आत्मिक रिश्ते की मिसाल बन चुके हैं। गौरतलब है कि विश्नोई समाज की स्थापना लगभग 550 वर्ष पहले गुरु जम्भेश्वर ने की थी। उन्होंने 29 सिद्धांत दिए, जिनमें जीव रक्षा, हरियाली संरक्षण और पर्यावरण संतुलन सबसे महत्वपूर्ण माने गए। यही वजह है कि आज भी इस समाज के गांवों में हिरण खुलेआम घरों के आसपास घूमते दिखाई देते हैं। वे इंसानों से भयभीत नहीं होते, क्योंकि पीढ़ियों से उन्हें यहां सुरक्षा और अपनापन मिला है।

ममता का मरुस्थलीय संसार

खेतोलाई और धोलिया गांवों में हाल के वर्षों में कई ऐसे मामले सामने आए, जहां नवजात हिरण शावकों की माताएं दुर्घटनाओं या शिकार की घटनाओं में काल का ग्रास बन गई। इसके बाद गांव की महिलाओं ने शावकों को अपने बच्चों की तरह पाला। स्थानीय लोगों के अनुसार गर्मियों में गांवों में विशेष जलकुंड बनाए जाते हैं, ताकि हिरणों और पक्षियों को पानी मिल सके। कई परिवार नियमित रूप से दाना डालते हैं। खेतोलाई निवासी निर्मला विश्नोई का कहना है कि कुछ समय पहले एक शावक की मां नहीं रही थी। वह लगातार कमजोर हो रहा था। घर की महिलाओं ने उसे गोद में रखकर पाला। गांव में कोई भी जीव घायल दिख जाए तो लोग तुरंत मदद को पहुंचते हैं। इसी तरह धोलिया निवासी शिव सोनिया मांजू का कहना है कि धोलिया गांव में हिरण इंसानों से डरते नहीं हैं। बच्चे उनके साथ खेलते हुए बड़े होते हैं। जब भी कोई शावक घायल या अनाथ मिलता है तो पूरा गांव उसकी देखभाल में जुट जाता है। महिलाएं रातभर जागकर उसकी सेवा करती हैं।

संरक्षण का सामाजिक विज्ञान

पश्चिमी राजस्थान में विश्नोई गांव सामुदायिक वन्यजीव संरक्षण का मजबूत उदाहरण माने जाते हैं। हिरणों की सुरक्षा को सामाजिक जिम्मेदारी और सांस्कृतिक गौरव से जोड़ा जाता है। घायल वन्यजीवों के उपचार के लिए ग्रामीण सामूहिक सहयोग करते हैं।

खेजड़ली का बलिदान आज भी जिंदा

1730 में जोधपुर के खेजड़ली गांव में खेजड़ी पेड़ों की रक्षा करते हुए 362 विश्नोई लोगों ने बलिदान दिया था। अमृता देवी के नेतृत्व में ग्रामीण पेड़ों से लिपट गए थे। यह घटना आज भी दुनिया के सबसे बड़े पर्यावरणीय जनआंदोलनों में गिनी जाती है और बाद के चिपको आंदोलन की प्रेरणा मानी जाती है।

एक्सपर्ट व्यू: हिरणों को समझा जाता है परिवार का सदस्य

सेवानिवृत्त शिक्षक मांगीलाल विश्नोई का कहना है कि विश्नोई जीवनशैली का मूल आधार जीव रक्षा है। हमारे समाज में हिरणों को परिवार जैसा माना जाता है। महिलाएं शावकों को अपने बच्चों की तरह पालती हैं। जरूरत पड़े तो स्तनपान तक करवाया जाता है। यह केवल परंपरा नहीं, बल्कि संवेदनशील जीवन दृष्टि है। इसी तरह अखिल भारतीय जीव रक्षा विश्नोई सभा के अध्यक्ष रामधन विश्नोई के अनुसार हिरण बेहद शांत जीव है।

उसका शिकार समाज को भीतर तक दु:ख पहुंचाता है। हम हिरणों को बच्चों की तरह रखते हैं। यदि कोई शावक घायल या अनाथ हो जाए तो पूरा समाज उसकी देखभाल में जुट जाता है। वन्यजीवों की रक्षा हमारी सांस्कृतिक जिम्मेदारी है।

Published on:
26 May 2026 08:26 pm
Also Read
View All