
अलगोजा वादक तगाराम भील को सम्मानित करते राष्ट्रपति।
सीमांत जैसलमेर जिले के निवासी प्रसिद्ध अलगोजा वादक तगाराम भील को सोमवार को राष्ट्रपति भवन में आयोजित सम्मान समारोह में राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मु ने तीसरे सबसे प्रतिष्ठित नागरिक सम्मान पद्मश्री से सम्मानित किया। राष्ट्रपति ने उन्हें कला के क्षेत्र में उनके योगदान और अलगोजा जैसे वाद्ययंत्र की स्वर लहरियों की मिठास को देश-दुनिया तक पहुंचाने के लिए सम्मानित किया। तगाराम भील के सम्मानित होने पर जैसलमेर के बाशिंदों ने खुशी का इजहार किया है। गौरतलब है कि जैसलमेर मुख्यालय से 7 किलोमीटर दूरी पर स्थित मूलसागर गांव के निवासी तगाराम भील का बचपन संघर्षों के साये में बीता। 62 वर्षीय तगाराम भील ने लोक वाद्य अलगोजा की मधुर धुनों को गांव की चौपालों से निकालकर अंतरराष्ट्रीय मंचों तक पहुंचाया। बेहद सादा जीवन जीने वाले तगाराम भील ने इस सम्मान को अपनी साधना, गुरुजनों के आशीर्वाद और क्षेत्रवासियों की दुआओं का परिणाम बताया।
तगाराम का संगीत सफर बेहद संघर्षपूर्ण रहा। बचपन में जब पिता घर पर नहीं होते थे, तब वे चुपके से अलगोजा निकालकर अभ्यास किया करते थे। महज 10 वर्ष की उम्र में उन्होंने इस वाद्य पर पकड़ बना ली थी और 11 साल की उम्र में पहला अलगोजा खरीदकर विधिवत संगीत यात्रा शुरू की। वर्ष 1981 में जैसलमेर के मरु महोत्सव से उनका मंचीय सफर शुरू हुआ, जो 1996 में फ्रांस तक पहुंचा। इसके बाद तगाराम भील ने अमेरिका, रूस, जापान, अफ्रीका सहित 15 से अधिक देशों में राजस्थानी लोक संगीत की प्रस्तुति देकर थार की सांस्कृतिक पहचान को वैश्विक स्तर पर स्थापित किया।
तगाराम भील केवल एक कुशल वादक ही नहीं, बल्कि एक दक्ष शिल्पकार भी हैं। वे अपने हाथों से अलगोजा तैयार करते हैं, जिनकी मांग देश-विदेश तक है। उनका जीवन इस बात का उदाहरण है कि लोक कला की साधना दिखावे की नहीं, बल्कि तपस्या की मांग करती है। गौरतलब है कि इससे पहले जैसलमेर के हमीरा गांव के कमायचा वादक साकर खान और बईया गांव के लोक कलाकार अनवर खान को भी पद्मश्री से सम्मानित किया जा चुका है।
अलगोजा एक सुशीर (वायु) वाद्य यंत्र है, जो बांस से बनी दो जुड़ी हुई बांसुरी (पाइप) का जोड़ा होता है। इसमें एक बांसुरी सुर के लिए और दूसरी ड्रोन निरंतर ध्वनि के लिए होती है, जिसे मुंह से हवा फूंककर बजाया जाता है। वादक एक साथ दोनों बांसुरियों को मुंह में दबाकर फूंकता है। एक से धुन निकलती है और दूसरी से लगातार स्वर निकलता है। यह राजस्थान, पंजाब, सिंध और गुजरात के लोक संगीत में प्रमुखता से इस्तेमाल होता है।
Published on:
25 May 2026 09:27 pm
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