राष्ट्रीय सुरक्षा के लिहाज से बेहद जटिल माने जाने वाले थार रेगिस्तान में सीमा निगरानी व्यवस्था को अभेद्य बनाए रखना सुरक्षा बलों के लिए एक बड़ी चुनौती बना हुआ है। यहाँ दिन में 50 डिग्री तक पहुँचता पारा, तपते रेत के टीले और सीमित संसाधन जवानों की राह में लगातार कठिन परिस्थितियां खड़ी करते हैं। ऐसे में सीमा की अचूक सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए अब पारंपरिक सैन्य रणनीतियों के साथ-साथ स्थानीय भौगोलिक परिस्थितियों के अनुकूल संसाधनों के उपयोग पर विशेष बल दिया जा रहा है।

जैसलमेर. पश्चिमी राजस्थान का थार रेगिस्तान केवल भौगोलिक दृष्टि से ही नहीं, बल्कि राष्ट्रीय सुरक्षा रणनीति के लिहाज से भी देश के सबसे जटिल क्षेत्रों में गिना जाता है। यहां फैले विशाल रेत के टीले, तेज गर्म हवाएं, सीमित जल स्रोत और अत्यधिक तापमान सीमा निगरानी व्यवस्था को लगातार चुनौती देते हैं। सरहद पर दिन के समय 45 से 50 डिग्री सेल्सियस तक पहुंचता तापमान और रात के दौरान बदलता मौसम सुरक्षा बलों के लिए कठिन परिस्थितियां तैयार करता है। ऐसे वातावरण में पारंपरिक सैन्य रणनीतियों के साथ स्थानीय परिस्थितियों के अनुरूप संसाधनों का उपयोग अब सुरक्षा ढांचे का महत्वपूर्ण हिस्सा बन चुका है।
इसी रणनीतिक सोच के तहत सीमा क्षेत्रों में ऊंट आधारित पेट्रोलिंग मॉडल प्रभावी मानी जा रही है। सीमा सुरक्षा बल की ओर से अपनाई गई यह प्रणाली विशेष रूप से जैसलमेर और बाड़मेर सेक्टर में सक्रिय है, जहां कई इलाकों में वाहन आधारित गश्त सीमित प्रभाव छोड़ती है। रेत के ऊंचे-नीचे टीलों और लगातार बदलती सतह के कारण भारी वाहन कई बार धीमे पड़ जाते हैं, जबकि ऊंट इन परिस्थितियों में संतुलित और निरंतर गति बनाए रखते हैं।
सीसुब सूत्रों के अनुसार थार का भूगोल सामान्य सीमा क्षेत्रों से पूरी तरह अलग है। यहां धूल भरी आंधियां दृश्यता कम कर देती हैं और कई बार इलेक्ट्रॉनिक निगरानी उपकरणों की क्षमता भी प्रभावित होती है। गर्मियों में तेज तापमान के कारण मशीनों की कार्यक्षमता पर असर पड़ता है, वहीं सर्दियों के दौरान घना कोहरा निगरानी चुनौतियां बढ़ा देता है। ऐसे में ऊंट आधारित गश्त केवल पारंपरिक व्यवस्था नहीं, बल्कि पर्यावरण आधारित रणनीतिक अनुकूलन का उदाहरण बनकर सामने आई है। सीमा क्षेत्रों में तैनात सुरक्षा अधिकारियों का मानना है कि ऊंट रेगिस्तानी इलाकों के लिए सबसे उपयुक्त संसाधनों में शामिल हैं। कम पानी में लंबी दूरी तय करने की क्षमता, रेत में स्थिर चाल और ऊंचाई के कारण दूर तक निगरानी संभव होना इन्हें गश्त व्यवस्था में उपयोगी बनाता है। कई संवेदनशील चौकियों पर ऊंट आधारित पेट्रोलिंग अब आधुनिक उपकरणों के साथ संयुक्त रूप से संचालित की जा रही है। ड्रोन, थर्मल कैमरा और डिजिटल संचार प्रणाली के साथ ऊंट गश्त एक पूरक सुरक्षा मॉडल तैयार कर रही है।
भविष्य की सीमा सुरक्षा केवल अत्याधुनिक तकनीक पर आधारित नहीं होगी। स्थानीय भूगोल, मौसम और उपलब्ध संसाधनों के अनुसार तैयार की गई हाइब्रिड सुरक्षा प्रणाली अधिक प्रभावी साबित हो सकती है। थार क्षेत्र इसका बड़ा उदाहरण बन रहा है, जहां आधुनिक निगरानी तकनीक और पारंपरिक संसाधनों का संतुलित उपयोग एक नई सुरक्षा संरचना तैयार कर रहा है। राजस्थान की अंतरराष्ट्रीय सीमा का विस्तार भी इस रणनीति की आवश्यकता को स्पष्ट करता है। जैसलमेर जिले में लगभग 464 किलोमीटर, बाड़मेर में 228 किलोमीटर, श्रीगंगानगर में 210 किलोमीटर और बीकानेर में 168 किलोमीटर लंबी सीमा सुरक्षा बलों की जिम्मेदारी का हिस्सा है। इतनी विस्तृत सीमा पर लगातार निगरानी बनाए रखना किसी भी सुरक्षा एजेंसी के लिए चुनौतीपूर्ण कार्य माना जाता है। सीसुब सूत्रों के अनुसार आने वाले वर्षों में रेगिस्तानी सीमा प्रबंधन और अधिक तकनीकी होगा, लेकिन स्थानीय परिस्थितियों के अनुरूप संसाधनों की भूमिका समाप्त नहीं होगी। ऊंट आधारित पेट्रोलिंग मॉडल इस बात का संकेत है कि आधुनिक सुरक्षा रणनीतियों में परंपरा और तकनीक दोनों का संतुलन आवश्यक है।