
जैसलमेर. एटीएम केंद्र पर दिव्यांगों और वरिष्ठ नागरिकों के लिए असुविधा।
जैसलमेर. केस-1 : रैंप बना, लेकिन उपयोग लायक नहीं
व्हीलचेयर से पहुंचे एक दिव्यांग उपभोक्ता एटीएम के बाहर ही रुक गए। रैंप मौजूद था, लेकिन ढलान इतनी अधिक थी कि बिना सहारे अंदर पहुंचना संभव नहीं हुआ। अंततः दूसरे व्यक्ति की मदद लेनी पड़ी।
केस-2 : पेंशन लेने पहुंचे, फिसलते-फिसलते बचे
बारिश के बाद एक एटीएम के प्रवेश रैंप पर फिसलन बढ़ गई। पेंशन निकालने पहुंचे वरिष्ठ नागरिक ने किसी तरह संतुलन बनाया। कुछ सेकंड की चूक बड़ी दुर्घटना में बदल सकती थी।
केस-3 : नकदी से पहले पार करनी पड़ी बाधा
एक अन्य एटीएम केंद्र पर प्रवेश द्वार के सामने ऊंचा प्लेटफॉर्म और हैंडरेल का अभाव मिला। सीमित गतिशीलता वाले व्यक्ति को एटीएम तक पहुंचने में सामान्य उपभोक्ता की तुलना में कहीं अधिक कठिनाई उठानी पड़ी।
डिजिटल बैंकिंग के इस दौर में एटीएम तक पहुंचना हर नागरिक का सामान्य अधिकार माना जाता है, लेकिन पत्रिका पड़ताल मैं यह सच सामने आया है कि कई स्थानों पर यह अधिकार अभी भी अधूरा है। कई एटीएम केंद्रों पर रैंप केवल औपचारिकता बनकर रह गए हैं। कहीं उनकी ढलान जरूरत से अधिक है, कहीं सतह फिसलनयुक्त है, तो कहीं सहारा देने वाले हैंडरेल ही नहीं हैं। परिणाम यह कि दिव्यांगजन, वरिष्ठ नागरिक, गर्भवती महिलाएं और सीमित गतिशीलता वाले लोगों के लिए बैंकिंग सुविधा दहलीज पर ही अटक जाती है। बैंकिंग सेवाएं तेजी से डिजिटल हुई हैं, लेकिन भौतिक सुलभता उसी गति से विकसित नहीं हो सकी। यही कारण है कि एटीएम तक पहुंचने का जोखिम कई लोगों के लिए नकदी निकालने से बड़ी चुनौती बन जाता है।
-कई एटीएम पर रैंप की ढलान मानकों से अधिक
-फिसलन रोकने वाली सतह का अभाव।
दोनों तरफ हैंडरेल नहीं
-प्रवेश मार्ग पर ऊंचे प्लेटफॉर्म और अवरोध।
-नियमित सुलभता निरीक्षण के स्पष्ट संकेत नहीं।
वित्त मंत्रालय की 2024 बैंकिंग एक्सेसिबिलिटी गाइडलाइंस एटीएम केंद्रों पर सुरक्षित ढलान वाले रैंप, एंटी-स्किड फ्लोर, दोनों तरफ हैंडरेल, व्हीलचेयर के घूमने लायक पर्याप्त स्थान और बाधारहित प्रवेश की व्यवस्था पर जोर देती हैं। दिव्यांगजन अधिकार अधिनियम-2016 भी सार्वजनिक सेवाओं तक समान पहुंच सुनिश्चित करने का प्रावधान करता है।
समस्या रैंप की कमी नहीं, बल्कि मानकों की अनदेखी है। कई स्थानों पर रैंप मौजूद हैं, लेकिन उनका डिजाइन ऐसा है कि व्हीलचेयर उपयोगकर्ता स्वतंत्र रूप से उनका उपयोग नहीं कर सकते। यानी सुविधा दिखाई देती है, लेकिन व्यवहार में कारगर नहीं है।
सुलभता का वास्तविक पैमाना यह नहीं कि रैंप बना है, बल्कि यह है कि कोई दिव्यांग व्यक्ति बिना किसी सहायता के सुरक्षित तरीके से एटीएम तक पहुंचकर वापस लौट सके। देश में वित्तीय समावेशन की चर्चा अक्सर डिजिटल भुगतान और बैंक खातों तक सीमित रहती है, जबकि वास्तविक समावेशन वहीं पूरा होता है, जहां हर नागरिक बिना किसी शारीरिक बाधा के बैंकिंग सेवाओं का उपयोग कर सके। एटीएम की दहलीज पर मौजूद छोटी-छोटी खामियां बड़ी रुकावट बन सकती हैं। ऐसे में जरूरत नए नियम बनाने की नहीं, बल्कि मौजूदा मानकों के सख्त पालन और नियमित निगरानी की है। रिजर्व बैंक को भेजे सुझावों में सभी एटीएम का एक्सेसिबिलिटी ऑडिट, तकनीकी मानकों का अनिवार्य पालन, एंटी-स्किड फ्लोरिंग, हैंडरेल, प्रभावी जल निकासी, ऑनलाइन शिकायत पोर्टल और समयबद्ध सुधार व्यवस्था लागू करने की मांग की गई है।
- पंकज भाटिया, बीमा क्षेत्र में कार्यरत व सामाजिक कार्यकर्ता
Updated on:
12 Jun 2026 08:36 pm
Published on:
12 Jun 2026 08:36 pm
