जैसलमेर

jaisalmer: बस दुखांतिका का एक बरस…आज भी रिस रहे जख्म, अपनों को हमेशा के लिए खोने वाले परिवारों की खो गई खुशियां

14 अक्टूबर 2025 को निजी बस अग्निकांड ने जैसलमेर के इतिहास में ऐसा जख्म दिया, जिसने 29 परिवारों की दुनिया उजाड़ दी। आग की लपटों में घिरी बस में 19 लोगों की मौके पर मौत हुई, जबकि 10 घायलों ने बाद में दम तोड़ दिया। हादसे को एक साल होने जा रहा है, लेकिन अपनों को खोने वाले परिवारों के लिए वह दिन आज भी असहनीय पीड़ा की याद है।
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Oct 13, 2026
jaisalmer news photo
जैसलमेर. बस अग्निकांड में दिवंगत राजेंद्रसिंह चौहान को श्रद्धा अर्पित करते परिवारजन।

जैसलमेर/लाठी. 14 अक्टूबर 2025 की तारीख.... जैसलमेर जिले के इतिहास में एक काले दिन के तौर पर दर्ज हो चुकी है। उस दिन जैसलमेर से जोधपुर जा रही निजी बस मुख्यालय से करीब 10 किलोमीटर दूर तक ही चली होगी कि आग की लपटों में घिर गई। देखते ही देखते बस आग का गोला बन गई और उसमें सवार 19 लोग हमेशा के लिए अपनों से बिछड़ गए और उन्हें एक बेहद दर्दनाक मौत मिली। बाद में घायलों में से 10 और जने जिंदगी की जंग हार गए। इस हादसे ने 29 लोगों को काल का ग्रास बना दिया और संबंधित परिवारों की दुनिया एकबारगी उजड़ गई। किसी ने पिता खोया, किसी ने जवान बेटा और किसी घर से भविष्य की उम्मीद ही छिन गई। अब इस दर्दनाक हादसे को एक साल पूरा होने जा रहा है, लेकिन पीडि़त परिवारों के लिए वह दिन आज भी बीती हुई तारीख नहीं, बल्कि जीवन का सबसे गहरा घाव है।

सहायता मिली, लेकिन अधूरी उम्मीदें बाकी

पीडि़त परिवारों के लिए आर्थिक सहायता तत्काल जरूरतों को पूरा करने का माध्यम बनी, लेकिन अपनों की कमी को मिटा नहीं सकी। जिन घरों में कमाने वाले सदस्य नहीं रहे, वहां जीवन की गाड़ी संभालने की चुनौती आज भी बनी हुई है। परिवारों का कहना है कि घोषणाएं तभी सार्थक होंगी, जब उनका लाभ जमीन पर दिखाई देगा। हादसे में जान गंवाने वालों की स्मृति में स्मारक या यादगार स्थल बनाने की मांग भी उठ रही है। परिजन चाहते हैं कि मृतकों की याद को स्थायी जगह मिले, ताकि आने वाली पीढिय़ां उस दुर्घटना और उसमें जान गंवाने वाले लोगों को याद रख सकें।

साथ का सफर अंतिम साबित हुआ

जैसलमेर निवासी राजेंद्रसिंह चौहान और मनोज भाटिया भी उस मौत की बस में सवार थे। चौहान और भाटिया जैसलमेर से पोकरण जा रहे थे। बस के आग से घिर जाने की घटना में मनोज जहां किसी तरह घायल अवस्था में बाहर निकलने में कामयाब हो गए जबकि राजेंद्रसिंह आग में झुलस गए। भाटिया को प्राथमिक उपचार के बाद उसी दिन जोधपुर ले जाया गया। जहां 5 दिनों तक मौत से संघर्ष करने के बाद वे जिंदगी की जंग हार गए। भाटिया जैसलमेर केमिस्ट एसोसिएशन के सचिव पद पर कार्यरत थे। उनके पुत्र पृथ्वी भाटिया ने बताया कि पिता की असामयिक मौत का दर्द पूरा परिवार उतनी ही शिद्दत से आज भी महसूस करता है। उन्होंने बताया कि उस मनहूस दिन को याद करके आज भी मन कांप उठता है। दुखांतिका में काल का ग्रास बने राजेन्द्रसिंह चौहान पेशे से मीडियाकर्मी होने के साथ समाजसेवा और खेलों से भी गहरे तक जुड़े थे। सकारात्मक सोच, मिलनसारिता और मददगार स्वभाव के लिए उनकी अपनी पहचान थी। उनकी पत्नी संगीता और पुत्र भव्यजीत सिंह और ह्रदयांश सिंह सहित अन्य परिवारजनों के आंसू आज भी बरबस निकल जाते हैं। उनके भाई पूर्व पार्षद देवीसिंह चौहान याद करते हैं कि दुर्भाग्य उस दिन चरम पर था। राजेंद्र जब एयरफोर्स स्टेशन के पास पहुंचे तो बस निकल चुकी थी। उन्होंने फोन पर बस को रेलवे स्टेशन पर रुकवाया और वहीं से सवार हुए। उन्हें कार से जाने की सलाह दी गई थी, लेकिन उन्होंने मुस्कुराते हुए कहा था—दो घंटे का ही तो रास्ता है। कुछ ही देर बाद थईयात के पास मौत बनकर आई आग की लपटों ने सब कुछ बदल दिया। राजेन्द्रसिंह चौहान क्रिकेट, बास्केटबॉल और वॉलीबॉल के अच्छे खिलाड़ी थे। उन्होंने अनेक युवाओं को खेल के प्रति प्रेरित किया। सामाजिक अभियानों में वे हमेशा आगे रहे और शहर के लिए कई जनहित कार्यों में सक्रिय रहे।

सरकारी कार्यालयों के लगाते चक्कर

लाठी के भील मोहल्ले का 22 वर्षीय ओमाराम भील सात भाइयों में तीसरे नंबर पर था। आर्थिक रूप से कमजोर परिवार में वह मजदूरी कर भरण-पोषण में हाथ बंटाता था। हादसे के बाद सात दिन तक उनका उपचार चला, लेकिन जान नहीं बच सकी। जवान बेटे की मौत से मां गहरे सदमे में हैं। भाई प्रकाश के अनुसार, स्थानीय विधायक की ओर से घोषित कुछ विकास कार्य स्वीकृत होने के बावजूद धरातल पर नहीं उतरे। परिवार को इनके लिए सरकारी कार्यालयों के चक्कर लगाने पड़ रहे हैं।

Updated on:
13 Oct 2026 09:02 pm
Published on:
13 Oct 2026 09:02 pm