
उबलते पारे में वन-संपदा लील रही आग, बजा रहा खतरे की घंटी
जैसलमेर. पहले बड्डा गांव के पास जंगल में तो अब सुल्ताना के समीप नहरी क्षेत्र। दोनों ही क्षेत्रों में रात को आग भभकी और लील गई वन संपदा को। जानकारों की मानें तो ‘कुदरती आग’ को बुझाना आसान नहीं है। दावानल किस वन या नहरी क्षेत्र में कब भडक़ जाए कोई नहीं जानता। दिन में भीषण गर्मी के दौरान अग्निकांड की आशंकाएं अधिक मानी जाती है, लेकिन अब बड्डा और सुल्ताना के समीप क्षेत्रों में रात के समय भीषण आग लगने की घटनाओं ने खतरे की घंटी बजा दी है। ऐसे में वन क्षेत्रों, विशेषकर नहरी इलाकों के पास अपार संपदा वाले जंगलों की सुरक्षा को लेकर ग्रामीणों के चेहरे पर चिंता की लकीरे उभरकर आने लगी है। हकीकत यह है कि वृहद् स्तर पर फैले जंगलों में एकाएक लगने वाली आग जब भयानक रूप धारण कर लेती है तो सभी साधन-संशाधन बेबस नजर आते हैं। यही कारण है कि विषम भौगोलिक क्षेत्रफल वाले सरहदी जैसलमेर जिले में आग पर काबू पाने के साधनों की कमी से स्थिति कोढ़ में खाज जैसी हो रही है। विगत वर्षों में गर्मी के दिनों में दावानल भडकऩे से बड़ी मात्रा में वन स पदा नष्ट हो चुकी है। सबसे बड़ी दिक्कत यह भी है कि नहरी व वन्य क्षेत्र में अग्निकांड की घटना होने से कई बार पेड़ों के जलकर स्वाह होने की घटनाएं सामने आ चुकी है। नहरी क्षेत्र में दमकल नहीं होने से कई बार जिला मु यालय या फिर पोकरण से दमकल मंगवाई जाती है, लेकिन जब तक ये पहुंचती है, तब तक बड़ी मात्रा में वन स पदा आग की भेंट चढ़ जाती है।
तबाही के बाद ही शांति
अधिकांश मामलों में अग्निकांड इतने भयानक रूप धारण कर लेते हैं, जिन पर काबू पाना आसान नहीं रहता। विगत पांच वर्षों में करीब दो दर्जन छोटी बड़ी घटनाएं हो चुकी है। जानकारों की मानें तो दावानल भभकने के अधिकांश मामलों में वन क्षेत्र में आग की भीषणता का दौर तभी शांत होता है, जब सब कुछ ‘खाक’ जो जाता है। सरहदी जैसलमेर जिले में गत पांच वर्षों से भीषण गर्मी में नहर किनारे या वन्य क्षेत्र में घने पेड़ों में आग लगने की घटनाएं घटित हो रही है।
...इसलिए चिंतित है पशुपालक
-जंगलों में भभकने वाली आग के कारण बड़ी मात्रा में चारा नष्ट होने की आशंका बन जाती है। ऐसे में पशुपालकों को पशुओं के आहार को लेकर इन दिनों परेशानियां बढ़ रही है। प्राकृतिक चारागाहों में पूर्व में हुए अग्निकांडों ने वन क्षेत्र व चारागाहों को लील लिया है।
...आखिर क्यों भडक़ रहा दावानल
-अधिकांश मामलों में भीषण गर्मी में कभी तेज हवा तो कभी घर्षण से आग विकराल रूप ले लेती है।
-चारागाहों या वन क्षेत्रों में उगी हुई घास सघनता के कारण मामूली चिंगारी से ही भभक जाती है और दावानल तबाही कर जाता है।
-संदेह यह भी जताया जाता है कि समाज कंटक कुदरती रूप से उगे घास व चारागाह को जलाने के प्रयास में ऐसे दावानलों को भडक़ात हैं।
6 वर्षों में आग लगने की 14 बड़ी घटनाएं
18 मार्च 2013- अवाय-चिन्नू क्षेत्र में नहर किनारे 12 घंटे तक भभकी रही भीषण आग।
6 अप्रेल 2013- सुथारवाला मंडी के पास चारे में लगी आग से हजारों क्विंटल चारा जला।
17 अप्रेल 2013- नाचना फांटा-पोकरण मार्ग में वन-विभाग के क्षेत्र में लगी भीषण आग।
1 मई 2013- भदरिया क्षेत्र में नहर किनारे लगी आग में सैकड़ों पेड़ हुए स्वाह।
4 मई 2013 - नाचना क्षेत्र में आग से वन क्षेत्र में जले पेड़
22 मई 2014- वन-विभग की नसर्री में लगी आग से बड्डा गांव में जले चार झोंपे।
24 मई 2015 - रामगढ़ नहरी क्षेत्र में भीषण आग ने मचाई तबाही।
21 मई 2016 - नाचना क्षेत्र में वन विभाग के पेड़ों में आग लगने से मची अफरा-तफरी।
23 मई 2016 - नाचना क्षेत्र के 1251 आरडी पुलिया से पहले लगी आग से दर्जनों पेड़ जलकर स्वाह।
14 अप्रेल 2017 - नोख क्षेत्र में आग लगने से वन्य क्षेत्र में हुआ नुकसान।
-29 मार्च 2018 - नाचना क्षेत्र में तीन किमी क्षेत्र में लगी आग में नष्ट हुई अपार वन संपदा
21 मई 2018- बड्डा गांव के समीप वनीय क्षेत्र में रात को भडक़ा दावानल
2 जून 2018 - सुल्ताना के समीप क्षेत्र में मुश्किल से काबू में आई आग ।
सावधान रहकर सुरक्षित रहें
कुदरती तौर पर लगने वाली आग के लिए अधिकांश मामलों में प्राकृतिक कारण ही जि मेदार माने जाते हैं। गर्मी के दिनों में ऐसी घटनाएं अधिक सामने आ रही है। भीषण गर्मी बढऩे के कारण ऐसी घटनाएं बढ़ गई है। सावधान रहकर सुरक्षा करने की जरूरत ह। संसाधनों व साधनों की बेहतर व्यवस्था कर ऐसी घटनाओं पर त्वरित काबू में पाने के प्रयास किए जा सकते हैं।