
जैसलमेर. मुफलिसी में जीवन पथ पर असाध्य बीमारी का बोझ ढो रही चांदबी के चेहरे पर आज कृतज्ञता झलक रही है तो परिवार के सदस्यों पर सुकून के भाव है। चंद रोज पहले एक अज्ञात भय उनके जेहन में था, जो अब काफूर हो चुका है। उसके दर्द पर मरहम लगाने वालों से न तो उसका कोई खून का रिश्ता था और न ही कोई पहचान। मानवीयता की अदृश्य डोर ने रिश्तों की तार को जो सबल बना दिया और एक बहन की पीड़ा को दूर करने को उन्होंने मिशन बनाया। ईश्वर ने भी इस पवित्र कार्य में उनका सहयोग दिया। नव जीवन पाने की खुशी चांदबी के चेहरे पर बिखरी मुस्कान व सजल आंखों से देखी जा सकती है। एक मुस्लिम बहन की असाध्य सी लगने वाली बीमारी का उपचार करवाने अनजान हिन्दू भाइयों ने जो बीड़ा उठाया तो ईसाई धर्म को मानने वाली डा. लिलिकुटी ने भी नि:शुल्क रूप से कठिन माने जाने वाले ऑपरेशन को पूरा कर यह संदेश दे दिया कि कोई भी धर्म धरती पर मानवता से बड़ा नहीं है। तालरिया पाड़ा निवासी चंादबी पत्नी रसीद को चार दिन पहले पेठ में गांठ होने के कारण मां तुझे सलाम संस्थान के सदस्यों ने एक निजी अस्पताल भर्ती करवाया। जब संबंधित सर्जन डा. लिलिकुटी को यह पता चला कि संस्थान के सदस्य एक अलग धर्म की उस महिला के उपचार के लिए पैसा एकत्रित कर रहे हैं, जिससे उनका न तो कोई रिश्ता है और न ही पहचान। खर्च ज्यादा था, कई दानदाता आगे भी आए। यह जानकार उन्होंने धन राशि लेने से मना कर नि:शुल्क ही कठिन समझे जाने वाले ऑपरेशन करने का बीड़ा उठाया और पेठ से गांठ को निकाल दिया। अब चांदबी स्वस्थ बताई जा रही है। आज जहां धर्म व जाति के नाम पर जहर घोलने वाले तत्वों की कमी नहीं है, वहीं सरहदी जैसलमेर जिले में मुस्लिम महिला का हिन्दू कार्यकर्ताओं के प्रयास से एक ईसाई डॉक्टर की ओर से नि:शुल्क उपचार करना यह दर्शाता है कि आज भी मानवीयता को सबसे बड़ा मजहब मानने वालों की कमी नहीं है।
सरहदी जिले में सद्भावना की मिसाल
हम उम्मीद यही करते हैं कि सरहदी जिले में सांप्रदायिक सद्भाव बना रहे। संस्थान के सदस्यों ने गरीब बहन के उपचार का बीड़ा उठाया तो मदद के लिए लगातार लोग जुड़ते रहे। ईसाई महिला चिकित्सक व अन्य सहयोगकर्ताओं ने भी धार्मिक सद्भावना का परिचय दिया। यह मिसाल जिले के बाशिंदों को काफी प्रेरित करेगी।
-आशीष व्यास, प्रतिनिधि, मां तुझे सला