प्रदेश के खनन सेक्टर का ताजा डेटा एक दिलचस्प तस्वीर पेश करता है- जो खदानों की संख्या के साथ-साथ क्षेत्रीय विकास, संसाधन उपयोग और पर्यावरणीय दबाव का पूरा ब्लूप्रिंट माना जा सकता है।
प्रदेश के खनन सेक्टर का ताजा डेटा एक दिलचस्प तस्वीर पेश करता है- जो खदानों की संख्या के साथ-साथ क्षेत्रीय विकास, संसाधन उपयोग और पर्यावरणीय दबाव का पूरा ब्लूप्रिंट माना जा सकता है। इस परिदृश्य में जैसलमेर 429 खदानों के साथ एक उभरते हुए खनन केंद्र के रूप में सामने आता है। हालांकि यह संख्या राज्य के बड़े खनन जिलों से कम जरूर है, लेकिन रणनीतिक रूप से यह मिड-हाई एक्टिविटी जोन में आता है, जहां विकास और जोखिम दोनों समानांतर चलते हैं।
राजसमंद - 2122
भीलवाड़ा - 1492
नागौर - 1182
मिड-रेंज एक्टिविटी
जालोर - 459
जैसलमेर - 429
झुंझुनूं - 416
लो-इंटेंसिटी या निष्क्रिय क्षेत्र
बारां - 39
धौलपुर - 78
हनुमानगढ़ - 0
-रेगिस्तानी भूगोल के बावजूद जैसलमेर में खनिज संपदा का उपयोग तेजी से बढ़ा है।
-ग्रामीण इलाकों में आर्थिक गतिविधि का विस्तार और ट्रांसपोर्ट, मशीनरी, श्रम आधारित रोजगार
-खनन रोजगार के अलावा कई सेक्टर को प्रभावित करता है। जैसे- ट्रक ऑपरेटर, डीजल सप्लाई, छोटे ढाबे और सर्विस यूनिट और लोकल सप्लाई चेन
खनन से राज्य और स्थानीय स्तर पर राजस्व में वृद्धि होती है, लेकिन इसके साथ संसाधनों पर दबाव भी बढ़ता है-
-बिना रिस्टोरेशन से स्थायी नुकसान का खतरा
-पर्यावरणीय इम्पैक्ट: धीमी लेकिन गंभीर चुनौती
-अधिक खदानों वाले जिलों में तेजी से बदलता भूमि का उपयोग
-जल संसाधनों पर अतिरिक्त दबाव, डस्ट और माइक्रो-पॉल्यूशन में वृद्धि
-रेत और पत्थर खनन से भू-क्षरण, भूजल स्तर में गिरावट व जैव विविधता पर असर
1-सस्टेनेबल माइनिंग मॉडल
2-माइनिंग के साथ हो रिस्टोरेशन
3-टेक्नोलॉजी आधारित मॉनिटरिंग
खनन उद्योग के विशेषज्ञ दीपक केला बताते हैं कि किसी भी जिले में अधिक खदानें होना, एक मजबूत आर्थिक इंधन हैं। यह दिखाता है कि क्षेत्र संसाधन आधारित विकास की ओर बढ़ रहा है। विकास टिकाऊ हो, इसके लिए जरूरी है पर्यावरणीय संतुलन बनाए रखा जाए और संसाधनों का नियंत्रित उपयोग हो।