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मरुस्थल में फोग झाड़ी लुप्तप्राय, संरक्षण के बिना गहरा रहा संकट

पोकरण क्षेत्र सहित पश्चिमी राजस्थान के मरुस्थलीय इलाकों में उपयोगी फोग झाड़ी तेजी से लुप्तप्राय होती जा रही है।

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पोकरण क्षेत्र सहित पश्चिमी राजस्थान के मरुस्थलीय इलाकों में उपयोगी फोग झाड़ी तेजी से लुप्तप्राय होती जा रही है। लगातार पड़ने वाले अकाल, नहरी क्षेत्रों के विस्तार और कृषि गतिविधियों में वृद्धि के कारण यह बहुउपयोगी वनस्पति अब अस्तित्व के संकट से जूझ रही है। कभी मरुस्थल की पहचान रही फोग झाड़ी अब कई स्थानों से लगभग समाप्त हो चुकी है, जिससे पर्यावरणीय संतुलन पर भी असर पड़ने लगा है।

नहरी विस्तार और आधुनिक खेती से खत्म हो रही प्राकृतिक वनस्पति

फोग झाड़ी मरुस्थलीय क्षेत्र की महत्वपूर्ण वनस्पति मानी जाती है। यह कम पानी में भी लंबे समय तक जीवित रहती है और भूमि पर फैलकर मिट्टी के कटाव को रोकती है। इसकी हरी पत्तियां पशुओं के लिए पौष्टिक आहार का कार्य करती हैं। साथ ही इसकी फलियों के बीजों से रोटियां बनाकर कठिन समय में लोगों ने जीवनयापन किया है। भीषण अकाल के दौर में यह झाड़ी मानव और पशु दोनों के लिए जीवनदायिनी साबित हुई थी।

अकाल में जीवनदायिनी रही, अब तेजी से घट रही संख्या

इसके अलावा फोग से निकलने वाला रस विषरोधी माना जाता है और इसकी लकड़ी ईंधन के रूप में भी उपयोगी है। क्षेत्र में नहरी सिंचाई के विस्तार और आधुनिक कृषि यंत्रों के उपयोग ने फोग झाड़ियों को सबसे अधिक प्रभावित किया है। सीमावर्ती नाचना क्षेत्र, जहां पहले फोग प्रचुर मात्रा में मिलती थी, वहां अब इसका अस्तित्व तेजी से घटा है। पोकरण फील्ड फायरिंग रेंज के अंतर्गत आने वाले नवतला, केरू, बालाना, काहला, सोजिया और एटा सहित कई गांवों में भी फायरिंग गतिविधियों के कारण यह वनस्पति लगभग समाप्त हो गई है।

हकीकत यह भी

फलसूंड, भणियाणा, लाठी, चांधन, अजासर, लोहारकी, चांदसर और बरड़ाना सहित कई इलाकों में भी कृषि विस्तार के चलते किसानों ने फोग झाड़ियों को काट दिया है। वनस्पति विशेषज्ञों के अनुसार यदि समय रहते संरक्षण के ठोस प्रयास नहीं किए गए तो यह प्रजाति पश्चिमी राजस्थान से पूरी तरह समाप्त हो सकती है। फोग को बचाने के लिए इसे अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी गंभीरता से लिया गया है और रेड डेटा सूची में शामिल करने की सिफारिश की गई है। पर्यावरण संरक्षण से जुड़े जानकारों का मानना है कि फोग झाड़ी का संरक्षण केवल पारिस्थितिकी संतुलन के लिए ही नहीं, बल्कि मरुस्थलीय जीवन और पारंपरिक ज्ञान को बचाने के लिए भी जरूरी है।