जैसलमेर जिले की जनसंख्या वर्तमान में अनुमानित तौर पर 9.15 लाख के स्तर पर पहुंच गई है। दूसरी तरफ 39 हजार वर्ग किलोमीटर क्षेत्रफल में फैला जैसलमेर देश के चुनिंदा सबसे विशाल भू- भाग वाला जिला है।
जैसलमेर जिले की जनसंख्या वर्तमान में अनुमानित तौर पर 9.15 लाख के स्तर पर पहुंच गई है। दूसरी तरफ 39 हजार वर्ग किलोमीटर क्षेत्रफल में फैला जैसलमेर देश के चुनिंदा सबसे विशाल भू- भाग वाला जिला है। विरल आबादी वाले इस जैसलमेर को दो शताब्दियों तक हर तरह के पिछड़ेपन की जकडऩ में रखा है लेकिन अब समय पूरी तरह से बदलता प्रतीत हो रहा है। भारत-पाकिस्तान की सीमा पर अवस्थित जैसलमेर की प्रमुख पांच पहचानों को राज्य सरकार ने पंच गौरव के रूप में स्वीकार किया है। इनमें एक उपज, वनस्पति प्रजाति, उत्पाद, पर्यटन स्थल और खेल के रूप में क्रमश: खजूर, जाल, येलो स्टोन के उत्पाद, सोनार किला और जिमनास्टिक को चिन्हित किया गया है। जानकारो के अनुसार राज्य व केंद्र सरकार अपनी योजनाओं में इन पांच प्रमुख तत्वों को जिले में करवाए जाने वाले कार्यों के संदर्भ में सही मायनों में शामिल कर लें और आमजन को इनसे जोड़ा जाए तो जैसलमेर विकास की बुलंदियां छूने में किसी से पीछे नहीं रहेगा।
जैसलमेर तापमान और शुष्क जलवायु खजूर की खेती के लिए उपयुक्त है। यही कारण है कि यहां सगरा-भोजका फार्म की स्थापना कर वहां बड़े पैमाने पर खजूर का उत्पादन किया जा रहा है। यहां की गर्म और सूखी जलवायु खजूर के पेड़ के लिए आदर्श होती है। जैसलमेर के आम किसान भी तेजी से खजूर की फार्मिंग को अपना रहे हैं। धीरे-धीरे ग्रामीण इलाकों में यह एक महत्वपूर्ण आय का स्रोत बन सकता है। खजूर का उपयोग विभिन्न प्रकार के खाद्य उत्पादों, मिठाई, पंखुरी, चटनी, और पाउडर बनाने में किया जाता है। इसका निर्यात बाहरी देशों तक किया जाता है।
जाल का वृक्ष जैसलमेर जिले के रेगिस्तानी इलाकों में प्राचीन काल से पाया जाता है। इस वृक्ष को 'कांचण' या 'कांचन वृक्ष' भी कहा जाता है। यह पेड़ कम पानी की आवश्यकता के कारण रेगिस्तानी इलाकों में जीवित रहता है। यह वृक्ष जैसलमेर की जैव विविधता का एक महत्वपूर्ण हिस्सा है और जलवायु परिवर्तन के कारण सूखा सहन करने की इसकी क्षमता को देखते हुए इसे अधिक महत्व दिया जा रहा है। इस वृक्ष की पत्तियां और छाल स्थानीय लोगों की ओर से पारंपरिक चिकित्सा में हमेशा से इस्तेमाल की जाती रही हैं।
जैसलमेर का निर्माण येलो स्टोन यानी सुनहरे रंग के पत्थरों से हुआ है, जिसके कारण इसे स्वर्णनगरी भी कहा जाता है। विगत कुछ वर्षों से पीला पत्थर केवल भवन निर्माण के ही काम नहीं आ रहा है। इससे अनेक सजावटी व दैनिक काम आने वाले सामानों व मूर्तियों आदि कलाकृतियों का निर्माण किया जाता है। जिनकी मांग जैसलमेर से बाहर देश के विभिन्न राज्यों में ही नहीं बल्कि विदेशों तक है। मुलायम होने के कारण इस पत्थर पर आसानी से मनचाही कारीगरी की जा सकती है। जैसलमेर में येलो स्टोन की खदानें शहर के के आसपास स्थित हैं। नए क्षेत्रों की तलाश करने का काम तत्परता से किया जाए तो यह पत्थर अपने दम पर 50 हजार से अधिक लोगों को रोजगार दिला सकता है।
सीमांत रेगिस्तानी जैसलमेर का दुर्ग इस पर बसने वाली करीब 3 हजार की आबादी और अनूठे स्थापत्य के लिए अद्भुत माना जाता है। देश-विदेश के सैलानी पिछले पांच दशक से इसे देखने खींचे चले आ रहे हैं। भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण विभाग की तरफ से संरक्षित इस दुर्ग व उसके आसपास के क्षेत्र के सौन्दर्यकरण की दिशा में प्रशासन की तरफ से कदम उठाए गए हैं। इस दुर्ग का निर्माण वर्ष 1156 में भाटी शासक रावल जैसल ने करवाया था। पीले बलुआ पत्थर से बना यह दुर्ग राजस्थान के महत्वपूर्ण पर्यटन स्थलों में एक है और इसे यूनेस्को की विश्व धरोहर स्थलों की सूची में शामिल किया जा चुका है। यह किला जैसलमेर की सांस्कृतिक धरोहर और स्थापत्य कला का जीवंत उदाहरण है।
एक खेल के रूप में जैसलमेर जिले के लिए जिमनास्टिक का चयन किया गया है। जैसलमेर में इस खेल की लोकप्रियता हाल के वर्षों में बढ़ी है। यहां के युवाओं के बीच शारीरिक फिटनेस और जिमनास्टिक से जुड़ी कई प्रतियोगिताएं वर्ष पर्यंत होती हैं। इस खेल में शारीरिक लचीलेपन, शक्ति और संतुलन की आवश्यकता होती है जो जैसलमेर के युवाओं में विशेषकर ग्रामीण क्षेत्रों में प्राकृतिक रूप से मिलती है। जैसलमेर में जिमनास्टिक की प्रतियोगिताएं आयोजित करवाने के लिए इंदिरा इंडोर स्टेडियम जैसा विशाल केंद्र है। आने वाले समय में इसे स्कूलों में भी बढ़ावा दिया जाए तो कई खिलाड़ी उभर कर सामने आएंगे।
पंच गौरव के रूप में चयनित उपज, वनस्पति प्रजाति, उत्पाद, पर्यटन स्थल और खेल के माध्यम से जैसलमेर जिले की तस्वीर और तकदीर बदल सकती है। ये सभी गौरव मरुस्थलीय संस्कृति और रहन-सहन से भी गहराई से जुड़े हैं। इन्हें आगे बढ़ाने से जिले का आर्थिक पक्ष तो सबल बनेगा ही, साथ ही जिले की पहचान और पुख्ता बनेगी। सरकार और प्रशासन की इस पहल से अधिकाधिक लोगों का जुडऩा आवश्यक है।