जैसलमेर

JAISALMER PATRIKA CAMPAIGN- अभियान -कहीं इतिहास न बन जाए मरु महोत्सव- मेजबान ही बेपरवाह तो आयोजन कैसे चढ़े परवान?

- बनी बनाई लीक से हटकर काम करने को तैयार नहीं पर्यटन महकमा- ऐन वक्त पर संभालते हैं हाथ-पांव  

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जैसलमेर . 1979 से निरंतर प्रतिवर्ष आयोजित होने वाले मरु महोत्सव की आभा अगर अब फीकी पड़ रही है तो सबसे बड़ा जिम्मेदार कोई और नहीं स्वयं मेजबान पर्यटनमहकमा माना जाना चाहिए। विभाग प्रत्येक आयोजन से महज पांच-सात दिन पहले हाथ-पांव संभालता है और फिर बनी बनाई लीक पर तीन दिन तक आयोजन को संपन्न करवादेता है। आयोजन के दौरान हर बार एक सरीखे चेहरे ही दिखाई देते हैं। न तो नए लोगों को जोडऩे की कवायद और न ही कार्यक्रमों में कोई बड़ा नवाचार जोड़ा जाता है। स्थानीय पर्यटक स्वागत केंद्र में जिम्मेदार अधिकारी अधिकांश समय उपस्थित नहीं रहते और सब काम गिने-चुने कार्मिकों के भरोसे रहता है।
नहीं बनाया जा रहा माहौल
जैसलमेर भ्रमण पर आए सैलानियों के साथ आमजन को कहीं से भी यह पता नहीं चलता कि, तीन दिवसीय मरु महोत्सव अब महज आठ दिन दूर है, क्योंकि इससे संबंधित एक भी हॉर्डिंग-बैनर अथवा पोस्टर-पम्फलेट नजर नहीं आता। विभाग के अधिकारी रटा-रटाया जवाब देते हैं कि, विभाग की वेबसाइट पर आयोजन से संबंधित जानकारी दे दी गई है। सवाल यह उठता है कि, जब मरु महोत्सव की तारीखें माघ मास की त्रयोदशी से प्रारंभ और पूर्णिमा तक समापन की पहले से तय होती है तो इसका प्रचार कुछ माह पूर्व से क्यों नहीं किया जा सकता? मसलन दिवाली और नववर्ष के समय जैसलमेर में हजारों की तादाद में आए सैलानियों को अगर इसकी जानकारी मिलती तो वे अपने गृह क्षेत्र में जाकर अन्य लोगों को इसके बारे में बता सकते थे।यही वजह है कि मरु महोत्सव के समय उतनी बड़ी संख्या में सैलानी नहीं जुटते, जितने यहां दिवाली या नए साल के सीजन में आते हैं।
विभाग दिखाता है कंजूसी
जिस आयोजन ने समूचे मरुस्थलीय क्षेत्र को पर्यटन फलक पर सम्मानजनक स्थान दिलाने में अहम भूमिका निभाई है, उस पर खर्च करने के लिए पर्यटन महकमा बेहद कंजूसी दिखाता रहा है। इस बार भी आयोजन के लिए केवल 34 लाख रुपए स्वीकृत किए हैं। गत वर्ष से एक लाख कम। इतनी कम राशि में आयोजन की व्यवस्थाएं कर पाना हमेशा टेढ़ी खीर साबित होता है। पर्यटन व्यवसायियों के सहयोग से ही आयोजन संपन्न हो पाता है। लेकिन, कार्यक्रमों के दोहराव व प्रचार-प्रसार में फिसड्डीपन के चलते ज्यादा सैलानियों के नहीं जुटने की वजह से पर्यटन व्यवसायियों के लिए धन-सहयोग करना मुश्किल साबित होता है।
अधिकारियों की खातिरदारी, सैलानियों को धक्के
मरु महोत्सव के दौरान सरकारी तौर-तरीके इस कदर हावी रहते हैं कि, इसमें शामिल होने वाले सैलानियों को कई बार बेकद्री का सामना करना पड़ता है। जबकि पर्यटन विभाग का सारा ध्यान अधिकारियों की आवभगत पर रहता है। कई दफा ऐसे मंजर पेश आए हैं कि, कार्यक्रम में बैठे हुए सैलानियों को यह कहकर उठा दिया जाता है कि, उक्त स्थान उनके लिए नहीं है। सैलानी, विशेषकर विदेशी ऐसे व्यवहार से खासे आहत होते हैं। कार्यक्रमों की बैठक व्यवस्था भी ऐसी की जाती है, जहां अधिकारियों और उनके परिवारों को वीआईपी होने का एहसास करवाया जाता है तथा सैलानी व अन्य आमजन खुद को उपेक्षित महसूस करते हैं।
अलग से बॉक्स -
‘मरुश्री’ के साथ ऐसा बर्ताव
मरु महोत्सव की सबसे प्रतिष्ठित प्रतियोगिता ‘मरुश्री’ के विजेताओं की ही कद्र पर्यटन महकमा नहीं करता तो अन्य प्रतियोगिताओं के विजेताओं अथवा प्रतिभागियों की बात करना बेमानी है। वर्ष 2017 के मरुश्री कपिल छंगाणी को अब तक पर्यटन विभाग ने प्रमाण-पत्र तक जारी नहीं किया है। छंगाणी ने जब इस बाबत विभाग से शुरुआती महीनों में सम्पर्क किया तो उन्हें बताया गया कि कलक्टर बदल गए हैं, प्रमाण पत्र पर अब नए कलक्टर के हस्ताक्षर करवाने होंगे। यह हस्ताक्षर आज तक संभवत: नहीं हो पाए हैं। उनसे पहले सुरेंद्रसिंह भायल भी प्रमाण पत्र के लिए तरसते रहे और अखबारी सुॢखयों का हिस्सा बने। वर्ष 2013 के मरुश्री विजय बल्लाणी ने चार वर्ष तक मरु महोत्सव को समर्पित कैलेंडर प्रसारित किए, लेकिन पर्यटन विभाग की प्रचार सामग्री में उन्हें कभी स्थान नहीं दिया गया। और तो और विभाग मेले के दौरान ही पहले दिन चुने जाने वाले मरुश्री को उसका वाजिब सम्मान नहीं देता।

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Published on:
22 Jan 2018 08:59 pm
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