12 अप्रैल 2026,

रविवार

Patrika Logo
Switch to English
home_icon

मेरी खबर

video_icon

शॉर्ट्स

epaper_icon

ई-पेपर

दंगल के गीत से पहचान पाने वाले लोक कलाकारों का आशा भोसले से रहा आत्मीय रिश्ता

सुरों की दुनिया में अपनी विशिष्ट पहचान बनाने वाली मशहूर गायिका आशा भोसले के निधन की खबर ने देशभर के साथ जैसलमेर के लोक कलाकारों को भी गहराई से भावुक कर दिया।

2 min read
Google source verification

सुरों की दुनिया में अपनी विशिष्ट पहचान बनाने वाली मशहूर गायिका आशा भोसले के निधन की खबर ने देशभर के साथ जैसलमेर के लोक कलाकारों को भी गहराई से भावुक कर दिया। उनकी आवाज केवल फिल्मों तक सीमित नहीं रही, बल्कि लोकधुनों के साथ उनका आत्मीय जुड़ाव दूरस्थ अंचलों तक महसूस किया जाता रहा है। जिले के बरना निवासी सरताज खां और डांगरी निवासी सरवर खां, जिन्होंने दंगल के चर्चित गीत ‘बापू सेहत के लिए तू तो हानिकारक है’ को स्वर देकर पहचान बनाई, उनके लिए यह खबर व्यक्तिगत क्षति जैसी है।

-मुंबई कार्यक्रम में साझा किया था मंच, लोक और फिल्म संगीत का दिखा अनूठा संगम

यह गीत आमिर खान अभिनीत फिल्म का प्रमुख आकर्षण रहा और दोनों कलाकारों को राष्ट्रीय मंच तक पहुंचाने वाला साबित हुआ। राजस्थान पत्रिका से खास बातचीत में सरताज खां ने बताया कि वर्ष 2018 में मुंबई में आयोजित एक विशेष कार्यक्रम में आशा भोसले के साथ मंच साझा करने का अवसर मिला। यह आयोजन फिल्म दंगल की सफलता से जुड़ा था, जहां लोक और फिल्म संगीत का अनूठा संगम देखने को मिला। उस शाम का हर क्षण उनके लिए आज भी स्मृतियों में सजीव बना हुआ है।

दो संगीत परंपराओं का मिलन

कार्यक्रम के दौरान जब केसरिया बालम की मधुर धुन गूंजी, तो आशा भोसले ने भी अपने विशिष्ट अंदाज में उसे स्वर दिया। यह प्रस्तुति केवल एक गीत नहीं रही, बल्कि दो संगीत परंपराओं के मिलन का भावपूर्ण क्षण बन गई। दर्शकों ने इसे भरपूर सराहा और यह अनुभव दोनों लोक कलाकारों के लिए जीवन की अमूल्य धरोहर बन गया। सरताज खां के अनुसार आशा भोसले का व्यक्तित्व जितना विशाल था, व्यवहार उतना ही सहज और आत्मीय रहा। उनकी सादगी और कलाकारों के प्रति सम्मान ने गहरी छाप छोड़ी। सरवर खां के साथ बिताए वे पल आज भी उसी आत्मीयता के साथ याद आते हैं। उन्होंने यह भी बताया कि जैसलमेर के लोक कलाकारों के लिए यह केवल एक महान गायिका का जाना नहीं है, बल्कि उस प्रेरणा स्रोत का खोना है, जिसने लोक संगीत को भी अपने स्वर में सम्मान दिया। सरजात खां ने कहा कि आशा भौसले की आवाज भले खामोश हो गई हो, लेकिन उनके सुर, उनकी शैली और उनसे जुड़ी स्मृतियां हमेशा जीवंत रहेंगी।