सीमावर्ती जिले जैसलमेर में गत रविवार को दिनदहाड़े हुई लूट की वारदात ने शहर की सुरक्षा व्यवस्था पर गहरे सवाल खड़े कर दिए हैं।
सीमावर्ती जिले जैसलमेर में गत रविवार को दिनदहाड़े हुई लूट की वारदात ने शहर की सुरक्षा व्यवस्था पर गहरे सवाल खड़े कर दिए हैं। अब तक शांत और सुरक्षित माने जाने वाले इस शहर में इस प्रकार की घटना ने आमजन के मन में भय और असुरक्षा की भावना को जन्म दिया है। यह केवल एक घटना नहीं, बल्कि जिले में अपराध के बदलते ट्रेंड का संकेत भी मानी जा रही है। अब तक जिले में अधिकतर मामलों में चोरी, झपटमारी या छोटे विवाद सामने आते रहे हैं, लेकिन हालिया वारदात में जिस तरह से बदमाशों ने घर में घुसकर महिला को बंधक बनाया और लूट को अंजाम दिया, वह एक सुनियोजित और पेशेवर अपराध का उदाहरण है। इससे साफ है कि अपराधियों की कार्यशैली में बदलाव आया है और वे पहले से अधिक संगठित तरीके से वारदात कर रहे हैं।
पिछले वर्षों में चोरी के मामलों में वृद्धि जरूर हुई है, लेकिन लूट जैसी गंभीर घटनाएं कम रही हैं। ऐसे में इस घटना को एक ' शिफ्टिंग पैटर्न' के रूप में देखा जा रहा है, जहां अपराध का स्वरूप अधिक जोखिमपूर्ण और योजनाबद्ध हो रहा है। जैसलमेर पर्यटन क्षेत्र होने के कारण यहां बाहरी लोगों की आवाजाही अधिक रहती है, जिससे संदिग्धों की पहचान करना कठिन हो जाता है। सीमावर्ती स्थिति भी अपराधियों के लिए मूवमेंट को आसान बनाती है। पुलिस सूत्रों के अनुसार वारदात से पहले घर की गतिविधियों पर नजर रखी गई थी। इससे यह स्पष्ट होता है कि अपराध अब आकस्मिक नहीं, बल्कि पूरी योजना के तहत किए जा रहे हैं। यह प्रवृत्ति भविष्य में कानून व्यवस्था के लिए चुनौती बन सकती है।
-टारगेट का पूर्व चयन और निगरानी
-परिवार की दिनचर्या की जानकारी जुटाना
-वारदात के लिए सही समय का चयन
-तेजी से घटना को अंजाम देकर फरार होना
जरूरत : पुलिस के फोकस एरिया
-संवेदनशील क्षेत्रों में अतिरिक्त गश्त
-सीसीटीवी कवरेज का विस्तार
-बाहरी व्यक्तियों की निगरानी
-सूचना तंत्र को सक्रिय करना
अधिवक्ता अरविंद गोपा का कहना है कि लंबे समय तक शांत रहने वाले शहरों में इस प्रकार की घटनाएं अचानक बढ़ने लगती हैं। इसे 'सॉफ्ट टारगेट सिंड्रोम' कहा जाता है। संगठित अपराध गिरोह अपेक्षाकृत छोटे शहरों को आसान लक्ष्य मानते हैं शहरवासियों की जागरूक व सतर्क होने भूमिका भी इस बदलते ट्रेंड में महत्वपूर्ण मानी जा रही है।